शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

कोई समझता क्यो नहीं।


                             


    मै एक स्कूल में एक प्राध्यापिका के पद पैर कार्य रत हूँ। विद्यार्थिंयों के अधयन की  देख रेख का एक अपना ही मजा है। तरह तरह का ज्ञान और तरह तरह के पात्र और हर पात्र कि अपनी पात्रता। अक्सर माता पिता अपने बच्चों के शैक्षिक विकास कि जानकारी लेने आते रहते है। कुछ लोग तो हमसे जानकारी पा  कर  संतुष्ट हो जाते है और कुछ हमें समझा कर कि हमें केसे बच्चों को शिक्षा देनी चाहिए,क्या करना चाहिए आदि आदि। ऐसे मई हैम पूरी तरह से दत्तचित्त हो कर उनकी बात सुनते है और जहाँ तक हो सके उनको आश्वासन भी देते हैं और मुस्कुरा कर विदा भी करते है। अधिकतर माता पिता पुत्र के भविष्य को ले कर चिंतित होते है। बेटिंयों का क्या है पड़ गई तो ठीक ,नहीं तो  घर संभालेगी  स्कूल में  भी लड़कों कि संख्या लड़कियो से अधिक है। ये समाज मे उभरती कुरीतिंयो का प्रत्य्क्ष प्रमाण है। एक दिन एक लड़की उम्र कोई १५--१६ साल होगी स्कूल में अपने भाई कि पढ़ाई के में  आई। पिछले साल तो अक्सर स्कूल आ कर भाई का हाल चाल पूछने आ जाती थी पर इस बार बहुत दिनों बाद आई। मेने मुस्करा कर उसका स्वागत किया और पूछा क्या बात है इस बार बहुत दिनों के बाद आना हुआ। "हाँ मैडम जी ,ससुराल गई थी " "सच ,मुझे लगा अभी तक तुम्हारी शादी ही नहीं हुई छोटी सी तो हो।  छम्म से उसकी आँखों में आंसू छलक   आये। तभी मेरी निगाह उसकी बांहो और गर्दन पर पड़े काले नीले निशानों पर पड़ी। उसकी आँखों में छलकते दुःख कि परछाइयाँ छुपी न रह सकी वो बोली "मैडम जी जब मेरी बड़ी बहन कि शादी हुई  थी तो हम तीन छोटी बहनो कि शादी भी साथ में थी। " "क्या तू सच कह रही है "मैने पूछा। "हाँ मैडम जी "उसके साथ उसकी छोटी बहन भी बेठी थी उसकी तरफ इशारा कर के बोली "मैडम जी मै तो फिर भी दो ढाई साल कि थी ,पर मेरी ये बहन तो अभी माँ का दूध पीती थी और इसकी शादी हो गई "अभी तक के सुने किस्से कहानियों के पात्र साक्षात मेरे सामने बेठे थे।      
                                                     
 
 बात को आगे बढ़ाते हुए वो बोली "हैम क्या जानते थे कि हमारी शादी हो रही है। एक ही मंडप में चार शादियाँ करा दी गई। "मैने पूछा" फिर विदाई भी हुई " वो बोली "हाँ हुई न क्य़ोंकि शादी के बाद एक दिन के लिए ससुराल जा कर  रहना पड़ता है। ""तो क्या तेरी इस छोटी बहन को भी ससुराल भेजा गया "मैने पूछा।"हाँ मेडम जी इसे भी ससुराल भेजा गया ,और मेरी माँ इसे दूध पिलाने इसकी ससुराल जाती थी। "मेरी ने पलक झपकना बंद कर दिया। "अरे तुम्हारे माँ बाप ने ऐसा क्य़ो किया। " "हमारे समाज का यही चलन है ,अब देखिये न एक साथ चार शादियाँ करने से कितना खर्चा बच गया। फायदा ही तो हुआ " "पर तेरी ये हालत केसे हुई " "अरे मेडम जी मेरा पति शराबी निकला। मार मार के मेरी ये हालत कर दी। जब बहुत रोई पीटी तो मेरे माँ बाप मुझे वापिस ले आये। मै अब पड़ना चाहती हूँ ,क्या आप मेरी मदद करोगे "मैने  कई तरीके से समझाया पूरी मदद करने का वादा भी किया पर वो तब कि गई फिर नहीं आई। बुराइयों से चाहे जान ही क्य़ो न चली जाये पर ऐसे नियमो को बदलने के लिए कुछ रूढ़िवादी लोग तयार नहीं है .
                                     
                        जरा से पैसे कि बचत के लिए लड़कियों का छोटी उम्र में विवाह कर  उन पर समाज के कठोर बंधन का बोझ डाल कर उन्हें दुःख भरी जिंदगी जीने को मजबूर कर -----ये  कैसी रीति है जो सोचती है कि वो सबका भला कर रही है। लाख कानून बने हो पर आज वर्ष २०१३ में मेरे सामने इन रीतियों का शिकार ये लड़किन्या बैठी थी। बदलाव के नाम पर जो हो रहा है क्या वह काफी है ---नहीं अभी नहीं। वो रीती रिवाज जो कुछ ऐतिहासिक घटनायों के कारण समाज मे लागु किये गए थे अब उनकी आवश्यकता नहीं है लड़की को पड़ने का जीने का पूरा हक़ है ,कोई समझता क्यो नहीं। 

पाठशाला

         
                                      

   पाठशाला एक ऐसी जगह है जहाँ तरह तरह के लोगों से मिलने का अवसर मिलता है ,रोज एक नया दिन रोज एक नई  कहानी। दसवीं कक्षा कि बोर्ड कि परीक्षा शुरू होने अभी कुछ ही दिन बाकि थे ,विद्यर्थिंयो को प्रवेश पत्र मिल चुके थे और चारों तरफ एक हलचल सी थे। हमारी पाठशाला में २५० बच्चे परीक्षा लिखने वाले थे। आज कल बच्चे ऐसे समय मे भी बहुत लापरवाह होते है। कभी कभी बहुत आश्चर्य होता है क्या इस देश का भविष्य मात्र पिज़्ज़ा और बर्गर बन कर रह जायेगा। उधर माता पिता जिन्होंने पिछले ६ वर्षों से बच्चे कि परवाह नहीं कि बोर्ड कि परीक्षा के समय अचानक से जागरूक हो जाते है। बच्चों कि छोटी से छोटी सुविधा का ध्यान रखते है। पर ऐसे बहुत कम लोग है जिनको पढ़ाई का धयान हो। ठीक भी है इसमें माता पिता कर भी क्या सकते है। ऐसे समय मई बड़ी कठिनाई से वे अपना कुछ कीमती समय निकल कर स्कूल आते हैं। अब सुनिये कि उन्हें काया चिंता सताती है.…परीक्षा शुरू होने से आठ दस दिन पहले से ही उनका पाठशाला आना जाना शुरू हो जाता है उनके चेहरे पे चिंता भी होती है क्य़ोंकि किसी ज़माने में उन्होंने भी ये परीक्षा बहुत ही तनावपूर्ण परिस्तिथिंयो में लिखी थी। "जी हम बस देखने ए थे कि सेंटर केसा है " ऑफिस में खड़े हो क्र पूछेंगे "क्या आपके स्कूल का नाम>>>>यही है " संदेह होता है बिना हमारा पता जाने ये यहाँ तक पहुंचे केसे और जवाब में हम उनकी तरफ देखते रहते है। "कितने कमरे है स्कूल में ' "क्या कमरों में पंखे लगे हैं। " "यदि आप बुरा न मने तो हम कमरे देख सकते है। " "आज कल पावर कट बहुत हो रही है क्या आप के पास जेनरेटर है। " "कमरे में पर्याप्त रौशनी है कि नहीं " "क्या तुबे लाइट चालू रखेंगे " "पानी का स्कूल में  क्या प्रबंध है , कोई पिलाने वाला है कि नहीं। "यहाँ तक तो और पूछताछ कुछ सही लगती है पर वे बच्चे जिन्होंने साल भर खूब मस्ती की ,जिनके माँ बाप ने उन्हें सदा इस बात का भरोसा दिलाया कि "तू चिंता मत कर सेंटर कोई भी रहने दो अपनी जानपहचान बहुत ऊपर तक है " इस ऊपर कि जानपहचान वाले इन बच्चों को उनके ही  माँ बाप  हकीकत से बहुत दूर कर देते है । ये सब बिना जड़ों के पौधे कि तरह पनपने वाला एक समुदाय है। ये वो बच्चे है जो आप को हर गली चोराहे और नुक्कड़ पर  देखने को मिलते है ,एक बाइक पर चार  चार ,पांच पांच सवार  मस्ती करते दिखते  है कभी सिगरेट फूंकते और कभी बात बात पर दूसरों से कूद कूद कर  झगड़ते दिख जाते है छोटे बड़े का लिहाज ये नहीं जानते। सीना घरों कि दीवारों और गलियारो में थूकना बात बे बात शान बघारना इनकी आधुनिकता कि पहचान है। बस आज का दिन है ---आज ही पूरा जीवन जीना है फिर कल पता नहीं हो न हो। मस्ती आज ही करनी कल पता नहीं कौन सी गाज गिर जाये। आज ही जवानी का जोश है ----जो चाहे कर लो ,कल सहानुभूति के चलते कैंडल मार्च निकाल  लेंगे अगले दिन फिर अपनी धुन अपनी मस्ती। संस्कारो को पैरों टेल रौंद क्र आगे बड़ रही इस विचारहीन  पीढ़ी को उनके तथाकथित नेतायों और 'भाई 'समाज का ही सहारा है। यहाँ पर इज्जत का सवाल ये है कि यदि दसवीं कक्षा भी पास न कर  सके तो शर्म कि बात होगी ,लोग निंदा करेंगे ताने देंगे "अरे इतनी ऊपर तक पहुंच है फिर भी दसवीं कक्षा पास न कर सके "अब ऐसे में स्कूलों पर भी दबाव पड़ता है।
                              

  परीक्षा से कोई दो दिन पहले एक सज्ज्न तीन रंग का तिलक लगाये दस ग्राम चमेली के तेल से बालों को संवारे अपने खादी  के कुर्ते पर पड़ी सिलवटों को सहलाते मेरे कार्यालय में सकुचाते हुए आये। मुझे लगा कोई केंद्र के बारे में जानकारी लेने आया है। मुस्कुरा कर उनका स्वागत कर उनको बैठने का संकेत  किया। "जी मेरे बच्चे कि दसवीं कि परीक्षा का सेंटर आपके स्कूल में पड़ा है ,आप लोग बच्चों के साथ बहुत सख्ती तो नहीं करते। "मेरा माथा ठनका  पूछा "जी मैं  समझी नहीं " "बात यह है कि हमारा बच्चा देशीय स्टार का खिलाडी है और अभी हाल ही मे प्रतियोगिता जीत कर लोटा है --------उसने पूरी तरह से परीक्षा कि तैयारी नहीं कि ---हैम चाहते थे कि -----जी वो कार्यरत नेता जी का बीटा है -----अब आप तो जानते ही है --समझ सकते है ---मुझे  बोलने का कोई मौका ही नहीं दिया जा रहा था ,इससे पहले वे मुझे मजबूर करने का कि कोशिश करते या कुछ और कहते और मै उनको साफ शब्दों मे इंकार करती और सदा के लिए नाराज कर  देती ---उनसे पीछा छुड़ाने के लिए मेने उन्हें पाठ शाला कि अध्यक्षा के कक्ष कि ओर इशारा कर दिया जहाँ उनको उनकी ही मातृ भाषा में अच्छी तरह समझा दिया जायेगा। अभी वे अंदर गए ही थे कि एक और खद्दर धारी प्रगट हुए। एक सैल पर बतिया रहे थे और दो सैल दूसरे हाथ में पकडे हुए थे ,दनदनाते हुए सीधे अध्यक्षा के कमरे मे घुस गए। सरे देश का भर जिन के सिर पर हो उनका पल पल कीमती होता है  तीन चार मिनट का इंतजार भी भारी लगता है और उनसे भी ज्यादा बेचैन हो रहे थे उनके हट्टे कट्टे बंदूकधारी  अंगरक्षक। नेतायों को किसी का इंतजार करने कि आदत तो होती  नहीं -----लोगों को ही घंटों उनका इंतजार करने की मजबूरी होती है ,

दरिया प्रेम का


           


                                                  खुसरो दरिया प्रेम का ,जो उल्टी बाकि धार ,
                                   जो उभरा सो डूब गया ,जो डूबा सो  पार।

                                   खुसरो बाजी प्रेम की मै खेलूं पी के संग ,
                                जीत गई तो पिया मोरे , हारी तो पि के संग।
                                                                           आमीर खुसरो

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

घूँघट

 घूँघट..
     


     कहा जाता है कि भारत में घूँघट की प्रथा तब से शुरू हुई जब से भारत पर  बाहरी देशोंका आक्रमण आरम्भ हुआ। विजयी सेनाए विजिट क्षेत्र में खूब उत्पात मचाती लूटमार के साथ महिलायों पर  तरह तरह के अत्याचार कर सब कुछ तहस नहस कर जाती। शायद तभी से इस्त्रियो ने परदे कि ओट में रहना शुरू कर दिया होगा। 
                              

     यह प्रथा उत्तर भारत में है दक्षिण भारत में पर्दे का चलन नहीं है कारण विदेशी शासकों के आक्रमण उत्तर भारत तक ही सीमित थे। हाँ अब कुछ अन्य धर्मो का पालन  वाली  महिलाये घूँघट ,बुरका या चादर का प्रयोग अवश्य करती है वो भी तब जब वे घर से बाहर निकलती है।
                              
     बहुत पुरानी  बात है जब मै मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहती थी। पूरा स्त्री समाज तीन स्तरों में बटा  हुआ था। वृद्ध महिलाये मात्र एक खददर कि  पहने  अधिकतर समय घर के बहार बरामदे में अनाज साफ करने में बिताती थी वे घूँघट तो नहीं निकालती थीं पर उनका सर हमेशा धोती के पल्लू से ढका रहता था पर निरंतर  बालों को खुजाते रहने से यह भी स्पष्ट था कि इनको हफ़्तों से धोया संवारा नहीं गया। दूसरी थी वो लड़कियाँ जिनका अभी विवाह या गौना नहीं हुआ था,वे घर के बाहर बेठी वृद्ध महिलायों और घर के अंदर खसर खसर  रोटियाँ बेलती बहु के बीच कि कड़ी थीं। बहुयों का घर के बाहर आना वर्जित था और दादी को जोड़ों के दर्द ने लाचार कर रखा था।
             

    ये लड़कियाँ दिन भर घर के अंदर बाहर करती रहती थी। खाली  समय में रिब्बन चोटी गूँथ कर साडी के पल्लू को दोनों कंधो पर डाले भविष्य के सपने देखा करती।  दिल्ली जैसे बड़े शहर से आ कर यहाँ बस गए थे। घूंघट में  फिरती महिलयो को चपलता पूर्वक कामकरते देखना मुझे बहुत अच्छा लगता था और डर भी लगता था कि ये अब गिरी कि अब ----अब इसका पानी का घड़ा गिरा पर वे बड़ी कुशलता से निकल जाती थी ,पर में कभी कभी पलकें झपकना भूल जाती थी।
                        

     इसी गांव के एक किनारे पर  एक  पंजाबी परिवार रहता था। अक्सर जाना होता था। उनका घर इस तरह से बना था कि घर के अंदर रौशनी और हवा के प्रवेश कि कोई गुंजाईश न थी। जब मेरी माँ आंगन में बैठ कर चाचीजी से बतिया रही होती थी तो में बाहर चबूतरे पैर आ कर बेठ जाती थी। घर के ठीक सामने सड़क के उस तरफ एक कुंआ था जिसकी  जगत करीब एक फुट ऊँची थी  पानी गिरने से सड़क पैर सदा कीचड बना रहता था। वो कुंआ कम किसी पत्रकार का दफ्तर अधिक लगता था। पचास से साठ घर के लोग यही से पानी भरते थे।
            

 ढोडी तक का घुंगट निकाले दो घड़े सर पैर रखे एक हाथ से तीसरा घड़ा कमर पैर टिकाये और दूसरे हाथ में एक बाल्टी और रस्सी थामे अपनी पड़ोसन से बतियाती बहु कुंए पैर पानी भरने आती इस बीच घर में क्या क्या कलह हुई सास नन्द या देवरानी और जिठानी किस बात पर  ,सब एक दूसरे को कह डालती।
                                                               

         बातों के बीच पानी भरने का काम चालू रहता यदि कलसा बाल्टी साफ करते समय घर के झगडे कि चर्चा हो रही होती तो उसका असर बर्तनो पर जरुर पड़ता मन का गुबार निकलने के चककर में बर्तनो को कब ज्यादा जोर से रगड़ना शुरू कर दिया ,वे जन ही न पाती। यदि कुंए से पानी खींचते समय यह चर्चा छिड़ जाती तो रस्सी को खींचते हाथ वहीं थम जाते ,एक पैर कुंए कि मेड़ पर टिका जाता और जरा से ऊपर उठे घूँघट में से काजल भरी आँखे साफ मटकती दिखाई देतीं और श्रोता को शब्दों से कहीं ज्यादा आँखों द्वारा मन कि व्यथा  सुनाई दे जाती और इसी बीच ठुड्डी पर पंजे कि बिखरी उँगलियाँ आ कर टिक जाती ,मानो  कही जा रही बात में  वजन डाल दिया गया हो।


                                 एक दूसरे का हाल  कह सुन कर महिलांए अपने पानी से भरे घड़े फिर उसी क्रम से उठाती घर कि तरफ चल पड़तीं। पानी से भरे घड़े जो एक बार सर पर टिका लिए तो फिर घर पहुँच कर ही उन्हेंहाथ लगाती। खली घड़ा जो पहले हाथ में पकड़ा था अब कमर पैर टिका लिया गया था और दूसरे हाथ में भरी बाल्टी और रस्सी पकडे वो हाथ भर का घूँघट निकले वे  महावर लगे पैरों को घीरे धीरे सावधानी से आगे बढ़ाती, पायल और बिछिये के नूपुरों कि मधुर झंकार पीछे छोड़ती अपने अपने घरों को बड़ जाती। उन दिनों घरों के दरवाजे ज्यादा ऊँचे नहीं होते थे। घर के अंदर जाने  के लिए वे नट जैसी कुशलता दिखाती और बाल्टी को वहीं छोड़ तीनो घड़े सम्भाले अंदर प्रवेश कर जाती।
         इतना वजन उठाने पर  चाल में एक कोमल सी लचक आ जाती थी और कदमो के उठने पर नूपरों कि  धव्नि भी लय बध हो जातीथी।   कवियों ने इस दृश्य पर जितनी भी रचनाएँ लिखी है उनका साक्षात्कार तो वहाँ रोज होता था । पर अब  सर्वांग प्रदर्शित करती नारी कि ओर देख कर लगता है कि कवियों कि लेखिनी भी विमुख हो गई है। इस तरह  सिर  पर दो दो घड़े  उठाये और कमर पर टिके घड़े को सम्भाले  गांव कि गोरी जब  किसी गली से गुजरती होगी तो उसकी एक झलक पाने के लिए लोग पवन के झोकों से गुहार करने लगते होंगे..  घूँघट  कि ओट में रह कर भी हर तरह का समाचार हर घर में  ऐसे ही पहुंचा करते थे।                               
                                                          नीरा भसीन





बुधवार, 27 नवंबर 2013

अहिंसा

         जब जब इस संसार सागर से पार उतरने के विचार हमारे मन मे आते है तो शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते है पेट मे बल पड़ने लगते है ,माथे पर पसीने के कण उभरने लगते है ,हाथ अनायास ही बेजान लगने लगते है ,और  हम जहाँ कहीं भी हों धप से अपनी जगह पर बैठ जाते है क्न्योकी हमारी टांगे शरीर का भार उठाने मे अचानक असमर्थ हो जाती है . ये विचार पल भर को ही सही कभी न कभी सब के जीवन मे आते रहते हैं , विचार जो क्षणिक हैं ,विचार जो मात्र कल्पना है ,विचार जो परिस्थितिन्यो वश उभरे ,विचार जो अपने बुरे कर्मों के कारण आये या विचार जो क्रोध के कारण उभरा था ---पर था तो एक सत्य ......   

        


                           
      आये हैं सो जांएगे रजा रंक फ़कीर -------ये हम सब जानते है .गीता का सार हो या फिर वेद पुरानो की वाणी सब एक ही दिशा की ओर ले जाते है --यह जीवन नश्वर है और इस सत्य को कोई झुठला भी नहीं पाया न ज्ञान और न विज्ञानं .....अंत को कोई भी रोक नहीं पाया ,न जीवन और न कोई व्यवधान .फिर यह सच इतना भयानक कंयो है --भयानक कहूँ या की कमजोर - जो मानव मात्र को सही राह दिखाने मे असमर्थ है .जब हम जान चुके हैं की ये जीवन क्षण भंगुर है  तो हमें जीवन का सुंदर रूप अपना लेने मे हिचकिचाहट कंयो होती है .
              एक क्रम से इस बात पर विचार करते है ,धरती पर प्रकृति ने अपने रूप का जाल फेला दिया और मानव जाति फलने फूलने लगी .श्रम कर कमाना और मिल बाँट कर खाना --नदी किनारे आश्रय बना कर जीवन जीना .कितना सुन्दर दृश्य जान पड़ता है अपना जीवन जीने के लिए हमने प्रकृति को नित नए संसाधनों से संवारा ,फल फूल प्राकृतिक आहार --क्रमबद्ध रितुन्यो ससे संवरता जीवन हमने नित नए रूप मे पाया .यहाँ एक बात धयान  देने योग्य है की जब तक हमने धरती ,जल और  वायु का बंटवारा नहीं किया था तब तक  मन मे शायद अहंकार की भावना ने जनम भी नहीं लिया था .
                 तेरी और मेरी इस अधिपत्य  की भावना से ही मन मे अहिंसा जाग उठी .एक ऐसी अहिंसा जिसे किसी प्रकार के अस्त्र शास्त्र की आवश्यकता नहीं थी .जब लोग छोटे छोटे घरों मै रहते थे जिसकी दीवारें मिटटी की और छत पत्तो से बनी होती थी --- तो उनमे सद भावना की कमी न थी --छत से किसी भी  घर मे पानी टपके, उसे सुधारने सारा कबीला जुट जाता था .धीरे धीरे दीवारें मजबूत और छतें पक्की हो गईं .अब जेसे हवा भी दरवाजे खिड्किन्यों के खुलने पर ही घर के अन्दर प्रवेश पा सकती थी और वेसे ही काबिले वाले हों या पडोसी निमंत्रण पा कर ही प्रवेश कर सकते थे .ये दूरियां  हिंसात्मक विचारों से प्रेरित थी ,जिसमे उंच नीच का भेद था ,अमीर -गरीब का भेद था ,रेशम और सूती वस्त्रों का भेद था ,पकवानो और रूखे सूखे भोजन का भेद था .एक बार जब ऐसे विचारों का जन्म हुआ तो बड़ी तीव्र  गति से सबके मानो मस्तिष्क पर इनका प्रभाव छागया .विकास की गति मे लोग अपने अपने घरों मे एक दूसरे के करीब तो रहने लगे पर मन से और भावनायों  से वे एक दूसरे से टूटने लगे .शब्दों के नश्तर ने अपनत्व का हनन कर दिया घरों की श्रृंखलाएं गगन चुम्बी इमारतों का समूह बन गई .पर अब सभी सुनी आँखों से भव्यता को निहारते रहते है ,कहीं कोई अपनत्व नहीं कहीं कोई ऐसी मुस्कुराहट नहीं जिसे अपना मान कर जी लिया जाये .हम सभी कहीं न कहीं किसी अपने को धुन्दते  रहते है, किसी सहारे को खोजते रहते है पर मन मे बड़ते अहम् ने हमारे विचारों मे हिंसा कूट कूट कर भर दी है बात समाज तक होती तो कुछ और होता या व्यक्ति विशेष की होती तो कुछ और होता पर ये तो प्रादेशिक असमानता है,यह खान पान की असमानता है ,यह धर्म की असमानता है यह भाषा की असमानता है जिसके रहते वैचारिक अहिंसा घर घर के अन्दर अपनी जड़ें जमा चुकी है .

             एक परिवार मे दो से दस तक या फिर कुछ कम ज्यादा सदस्य भी हो सकते है .....सभी मानसिक हिंसा का शिकार है .कोई आयु मे बड़ा है तो वो किसी को कुछ भी कहने का अधिकार रखता है ..छोटे है तो सुन लिजीए इतना तो बड़ों का हक़ बनता है .कोई अपने काम मे दक्ष है तो समाज ताने देता है की होशियार है तो क्या कुछ भी करने का अदीकार मिल गया कुछ भी कहने का अधिकार मिल गया .या फिर अमुक स्वजन की इतनी हिम्मत की वो हम से आगे निकल जाये ------इस अहंकार के चलते दूसरों की सफलता की राह मे जीतनी हो सके उतनी अडचने पैदा करना .

                   

और यदि कोई ऐसी परिस्थिति मे दुर्भाग्य वश असफल हो गया तो --फिर देखिये कितनी ख़ुशी मिलती है तमाशा देखने वालों को .पर ये आत्मा को तृप्त करना है या वैचारिक हिंसा .कुछ और घरेलु हिंसाएँ है जो भारतीय परिवारों मे बहुत विकराल रूप धारण  कर चुकी है उदाहरन के लिए सास बहु के झगडे दहेज़ को ले कर प्रतारणा ,शराब पी कर मार  पीट करना आदि .ये हिंसा के वो प्राथमिक रूप हैं जो भोतिकता का मोह बदने के साथ साथ बड़ते चले जा रहें है .ममता भरा आंचल हो या फिर पिता की विशाल छत्र छाया यह तब तक ही ठंडक पहुंचाती है जब तक भावी पीडी आंख मूंद कर उसका अनुसरण करती है ---जहाँ जरा से विचार  बदले नहीं की मात्रु  -  पित्र ऋण की दुहाई देना शुरू हो जाता है .हमारी युवा पीड़ी की आत्मशक्ति को देख कर ही स्वामी विवेकानंद जी ने गुहार लगाई थी "उठो आगे बड़ो और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये " पर बदलाव की राहें बड़ी कंटक पूरण है और अंध विश्वास की जंजीरें बहुत मजबूत .घरेलु हिंसा कहें या वय्व्हारिक  हिंसा ये तो प्लेग जेसे  रोग से भी अधिक भयानक है .प्लेग का शिकार व्यक्ति झट पट भौतिक क्या छोड़ देता है पर विचारों की हिंसा ,शब्दों की हिंसा ,व्यव्हार मे हिंसा ये सारी हिंसाएँ मनुष्य को तिल तिल कर मारतीहैं और इतना ही नहीं इसकी जड़ें संक्रामक रोग की तरह सदियों से गहरी होती जा रही है .और अधिकतर यह भी देखा गया है जहाँ भौतिक सुख व् ज्ञान अधिक होता है 
                          

वहीँ इस तरह की हिंसा भी अधिक पाई जाती है .यदि आज दान दहेज़ का लालच इतना अधिक न बड़ गया होता शायद  कन्या के पैदा होने से पहले ही उसको मार न दिया जाता .समाज का वह पहलु जिसके साये मे जीवन फलता फूलता है वो इतना श्री हीन न हो जाता .कभी कभी लगता है यदि दहेज़ प्रथा न होती तो नारि ही नारि की दुश्मन न होती -वो धन के नाम पर या  ,कुल व  जाति के नाम पर ,अपनी भावी पीड़ी को अपमानित न करती .कितना विभित्स्य दृश्य है .एक नव विवाहिता, एक कन्या को जनम देने जा रही है और उसकी  तथाकथित सास अर्थात एक और महिला उसको जन्म से पहले ही समाप्त करने का हठ कर रही है और एक और महिला जो सदा दूसरों के   जीवन की  रक्षा का प्रमाण्पत्र ले चुकी है  सफ़ेद कोट पहन कर कुछ धन पाने की आशा से एक आजन्मी कन्या का आस्तित्व मिटाने को तेयार खड़ी है .यहाँ किस की आंखे नाम हैं ,कोन आगे बड़ रहा है इस हिंसा को रोकने ?जननी का आंचल क्यों छोटा पड़ रहा है .हम जागरूक भविष्य की कल्पना करते है तो क्या यही है हमारी नीव .कहने को हमारा देश महात्मा गौतम का देश है . महावीर का देश है जिन्हें अहिंसा का जनम दाता कह सकते है .शायद वो बीते दिनों की बातें है पर ये बातें कितनी  सच है कहाँ तक सच हैं यह एक एतिहासिक सच है या तथ्य है पर है विचारणीय .दूसरी ओर महात्मा गाँधी- जो आज का सच है. कुछ लोग तो आज भी जीवित हैं जिन्होंने गाँधी जी को देखा है .हम सभी गाँधी जी को  उनकी  अहिंसा के आदर्शों के कारण महान मानते व पूजते है एक ऐसी अहिंसा जिससे एक देश दूसरे देश को परास्त कर सकता है ---
        आत्म विश्वास और आत्मबल से -जिसने समाज मे जाति पांति की  रीत को उंच नीच की भावना को  मिटा कर सादभावना को जन जन मे  जगाया -उस गाँधी  के देश मे वैचारिक  हिंसा के इतने विकराल रूप हैं की लोग अपने ही घरों मे पल पल मर रहे  है .ऐसा क्या हुआ की अहिंसा के प्रतीक भारत देश के वासी वैचारिक हिंसा के शिकार बन बेठे .हमारे दिल से दूसरों को माफ़ कर देने की भावना मानो लोप हो चुकी है एसा कंयो हो रहा है 
     आज न ज्ञान की कमी है न  विज्ञानं की न धन कीकमी है  न संपदा की ,न योग की न   पूजा की फिर क्या खोज रहे है हम .कब तक औरत ही औरत की दुश्मन बनी रहेगी और पुरुष धव्न्सक हमें अब अपने आप को सही दिशा देनी होगी और अपने कर्मों को मानवोपयोगी बनाना होगा वाणी मे सनेह नम्रता और आशीर्वादों को स्थान देना होगा

हम याद रखें कविओं की वाणी --
                 ऐसी वाणी बोलिए मन का आप़ा खोय
                 ओउरण को सीतल करे आपहु सीतल होए .
                 परिस्थितियों के कारण उपजी हिंसा जिससे देश और समाज का कभी कभी उद्धार  हो जाता है पर हिंसा के कारण उपजी परिस्थितियों से मनुष्य कभी कभी जीवन भर के लिए रोगी बन जाता है .बात है मात्र संयम और संस्कारों की. अपने स्वाभिमान की रक्षा हम तभी कर पाएंगे जब दूसरों के स्वाभिमान की रक्षा करने मे हम सक्षम होंगे .कुछ मुठी भर लोग समूचे समाज के विचारों मे बदलाव नहीं ला सकते इसके लिए हम सब को प्रयत्न करने होंगे .साधू संतो की कही वाणी का अनुसरण करना होगा--- वे साधू संत जिन्हों ने वेद पुरानो की रचनाएँ कीं या वे समाज सुधारक जो अँधेरे मे उजाले की एक किरण बन कर चमके..

               ALL POWER IS WITHIN YOU BELIEVE I N THAT .STANDUP AND EXPRESS THE DIVINITY WITHIN YOU. GIVE UP JEALOUSY AND CONCEIT .THIS LIFE IS SHORT ,THE VANITIES OF THE WORLD ARE TRANSIENT ,BUT THEY ALONE LIVE WHO LIVE FOR OTHERS ,THE REST ARE MORE DEAD THAN ALIVE .GO TO HELL YOURSELF TO BUY SALVATION
FOR OTHERS . 
-- SWAMI VIVEKANAND JI
                              
            महावीर ,गौतम और गाँधी जी की अहिंसा भारत देश पर बस एक लेबल की तरह चिपकी है .ये शायद कानूनी हिंसा है जिसे हम सबूतों के आधार पर नापते है पर उस हिंसा  को केसे रोका जाये जो हर  घर के बंद दरवाजे  के अन्दर पनप रही है ,जो हर व्यक्ति के विचारों मे बस रही है ,जो समाज से शांति और घरों से सुख  लूट रही है .क्या यह सही न होगा की अब हम सब  एक ऐसी शिक्षा का आवाहन करें जिससे हमारे विचारों की हिंसा दूर हो सके .


नीरा भसीन
ब्लोक २६ हाउस नंबर ४०१
मलेशियन टाउनशिप
के पि एच पि कालोनी
हैदराबाद ७२

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

गुरूनानक देव जी

          गुरूनानक देव जी के जन्मदिन पर मैं उनको शत शत प्रणाम करते हुये उनकी महानता के विषय में दो शब्द कहना चाहूंगा। जो इस प्रकार हैं:
    इसके पहले कि मैं आगे कुछ लिखूं मैं यह बताना उचित समझता हूं कि मैं पिछले साठ साल से इस बुन्देलखण्ड में रह रहा हूं तथा मेरे बोलने की भाषा में हिन्दी तथा पंजाबी के शब्द मिक्स हो सकते हैं। जिस पर मैं निवेदन करना चाहूंगा कि मेरे शब्दों पर ध्यान न देते हुये मेरे विचारों को सुनने की कृपा करेंगे
           


1.     गुरूनानक देव जी सदा ब्रम्हलीन रहते थे। जैसा  कि उनके चित्रों से उनकी आंखों को देखने पर पता चलता है कि वे सदा तुरीय अवस्था में रहते हैं। इस पर गुरूवाणी में ये शब्द आता है कि ‘‘नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात‘‘ ऐसा ध्यान अवस्था में होता है।
2.    वे सदा समर्पण और सादगी में रहे। ईश्वर तक पहुंचने में जब तक निष्कपट होकर, अहंकार त्यागकर पूर्ण श्रद्धा के साथ उसका ध्यान न किया जाये उस तत्व तक पहुंचना बड़ा कठिन है। ध्यान अवस्था में अपने आपका कोई ध्यान नहीं रहता नानक देव जी ने स्वयं कहा है (रब मिलदा गरीबी दाबे दुनिया मान करती)
3.    सेवा और समभाव जब तक एक दूसरे के प्रति विश्वास और सम्मान न हो तब तक अहम नहीं छूटता और सेवा सच्चे मन से तभी हो सकती है जब अपने अहम का त्याग किया जाये। गुरूनानक देव जी ने समभाव को प्राथमिकता दी और यह कहा गया (रल छकिये वंड खायिये) जब तक ऐसी भावना न होगी समाज आगे नहीं बढ़ सकता और यदि ऊंच नीच की भावना होगी तो समता नहीं हो सकती। गुरूनानक देव जी ने इसी बात को ध्यान में रखते हुये गुरू दरबार में किसी को प्राथमिकता नहीं दी। सबको बराबर समझा और आज गुरूद्वारे का लंगर भी इसी बात का प्रमाण है कि आपस में भाईचारा बने मिलबांटकर खायें पियंे ताकि हमारा कोई भी भाई पिछड़ न जाये। इसके साथ ही गुरूद्वारे के अंदर अन्य प्रकार की सेवायें करने पर मनुष्य का अहम मिटता है। जो कि अन्य धार्मिक स्थलों पर देखने को कम मिलता है।
4.    सबसे महत्वपूर्ण बात गुरूनानक देव जी ने ये की कि अपने गुरू होने के अहम को भी समाप्त कर दिया और अपने शिष्यों को महानता देते हुये शिष्य पंथ चलाया। शिष्य शब्द को अपभ्रंश पंजाबी भाषा में सिख कहते हैं। यह एक उनकी बहुत बड़ी महानता थी। एक श्लोक आता है कि (कीट न जाने भ्रंग को ) प्रभु कर ले आप समान परन्तु गुरूनानक जी ने तो इससे भी एक कदम आगे बढ़कर शिष्य परंपरा को चला दिया। एक जगह आचार्य श्री राम शर्मा ने लिखा है कि फूल की तरह खिलें और चंदन की तरह सुगंधित हों तो भगवान भी सिर पर बिठा लेता है। 

           


5.    गुरूनानक देव जी अद्वैत मत को मानते थे। वेद में लिखे अद्वैत शब्द का अर्थ है कि उस ईश्वर के सिवाय और कोई है ही नहीं। इसी को पंजाबी भाषा में उन्होने एक आंेकार कहा और इसी के आधार पर हर शिष्य को जपजी साहब का पाठ करने के लिये कहा गया। जिसमें ईश्वर की महिमा व गुरू की कृपा से ईश्वर की प्राप्ति होती है। इन्हीं शब्दो के साथ मैं गुरूनानक देव जी को शत्-शत् प्रणाम करते हुये ये कहना चाहूंगा कि
धन गुरूनानक, धन गुरूनान... 
                                                                                लाल चन्द्र चड्ढा
                                                                                नोगाव नाका
                                                                                झाँसी रोड
                                                                                 छतरपुर (म.प्र.)

क्या वेद और हिन्दू लुप्त हो गये हैं ?

         मेरे आदरणीय, परम पूजनीय पिताश्री ने यह लेख लिख कर कुछ चर्चात्मक बिंदुओ पर प्रकाश डाला .. निसंदेह यह गंभीर चिंतन का विषय है.. नीरा

       आदिकाल में जब धरती पर अन्य जीवों का जन्म हुआ तो इसके साथ मनुष्य का भी जन्म हुआ। धरती पर सुव्यवस्था बनाये रखने के लिये और संरक्षण के लिये यह दायित्व ईश्वर ने मुनष्य को सौंपा क्योंकि मनुष्य में अन्य जीवों में बुद्धि के साथ मनुष्य को विवेक शक्ति अलग से दी गई। जिससे कि मनुष्य को धरती का सर्वश्रेष्ठ जीव माना गया।
                       

   

 इस व्यवस्था के अन्तर्गत आदि ऋषियों ने तीन वेद लिखे जो कि ज्ञान, भक्ति और कर्म पर आधारित हैं। जिनका नाम ऋक् , साम्य, यजु रखा गया । बाद में उद्यमिता वृद्धि और विज्ञान के आधार पर अथर्ववेद रचा गया। आगे की व्यवस्था को चलाने के लिये चार वर्ण बनाये गये। ब्राम्हण को विद्या का अधिकार दिया, क्षत्री को जीवों की रक्षा, वैश्य को खेती व्यापार और शूद्र को अन्य कार्यों को संपन्न करने तथा सहायतार्थ सेवा कार्य सौंपा गया। इसमें केवल यह व्यवस्था थी, कोई ऊंच नीच नहीं थी।
    जैसे जैसे मनुष्य जाति की संख्या बढ़ी यह फैलते गये जो भारत की ओर बढ़े वे आर्य कहलाते थे। बाद में सिन्धु और फिर हिन्दू कहलाने लगे। कालान्तर में ब्राम्हण जाति ज्ञानी होने के नाते अहंकारवश अन्य जातियों से अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे और यहां से असमानता और छुआछूत चालू हो गई। कुछ समय बाद ब्राम्हण जाति ने अद्वैत को न मानकर अन्य देवी देवताओें को मानते हुये अंधविश्वास और कई प्रकार की कुरीतियों को जन्म दिया और अन्य जातियों को स्वर्ग तथा पुण्य लाभ के लालच में भ्रमित कर अपना प्रभुत्व जमाये रखा जो आज तक चल रहा है।
    इस विषय पर आदिशंकराचार्य से किसी शूद्र द्वारा शंका करने पर आदि शंकराचार्य ने इस प्रकार कहा था कि ‘‘जन्मना जायते शूद्रा संस्कारात द्विज उच्यते, वेदपाठी भवेत विप्रा ब्रम्हणां जानाति ब्राम्हणां‘‘ परन्तु ब्राम्हण समाज नेे इसे स्वीकार नहीं किया और अहंकारवश अपने अंधविश्वास और कुरीतियों को जारी रखा।
    कभी किसी ने शंका की तो उसको जबरदस्ती दबा दिया गया और उसका बहिष्कार तक कर दिया। तुलसीदास जी ने तो और भी हद कर दी कि पूजिये विप्र विवेक कुल हीना ऐसा क्यों ?
     इस विषय पर  आगे कुछ लिखने के पहले मैं कुछ दिन पहले श्री रामजेठ मलानी द्वारा श्री राम सीता व लक्ष्मण पर उठाई गई शंकाओं पर लिखना चाहता हूं।
    ये शंका जिस शब्दावली के साथ उठायी गई वह अशोभनीय है। श्री रामजेठ मलानी को एक उच्च कोटि का वकील होते हुये और हिन्दूवादी जनता पार्टी के एक उच्च राजनेता होते हुये ऐसा नहीं लिखना चाहिये था। संतों द्वारा इस पर नाराज होना व किसी अन्य द्वारा उनकी जिह्वा काटने पर 11 लाख का इनाम घोषित करना भी उचित नहीं था।   
    संत वही हैं जो सम हो और शंका का समाधान करे। नाराज होना संत का धर्म नहीं है, शंका करना शिष्य का धर्म है तथा समाधान करना गुरू का दायित्व है।
    कुछ आगे लिखने के पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं जो कुछ भी लिख रहा हूं वह केवल तुलसीदास जी द्वारा रचित रामायण तथा नरेन्द्र कोहली द्वारा लिखा गया रामायण पर आधारित नोवल के कुछ अंशों पर आधारित है। 

                                           

  1.     राम थे या नहीं .............राम हमारी ही तरह मनुष्य थे। ज्ञानवान्, मृदुभाषी, योद्धा और दूरदर्शी थे। राजा रघु के वंशज पांचवीं पीढ़ी राजा दशरथ के पुत्र थे। इसके आगे और तो नहीं जानता परन्तु इंटरनेट पर दी गई जानकारी के आधार पर राम के पुत्र कुश के वंशज लाखों परिवारों की संख्या में आज भी खुखरान के नाम से इस धरती पर हैं।
    2.    लक्ष्मण - राम की सौतेली माता सुमित्रा के पुत्र थे।
3.    सीता को गर्भ अवस्था में घर से निकालना, मांझी या धोबी की कहानी पर आधारित नहीं है। इसमें सीता को घर से निकालने के लिये पूर्णतया शान्ता जिम्मेवार है। क्योंकि सीता के वनवास से लौटने पर शांता सीता के चरित्र पर संदेह करती थी और राम को सीता के विरूद्ध उसके चरित्र को लेकर अक्सर उकसाती थी। राम क्योंकि शांता को बहुत चाहते थे उनकी बातों में आकर सीता को घर से निकाल दिया। किसी राजकन्या पर ये दोष न आये मल्लाह अथवा धोबी की कहानी को आधार बना दिया गया।
4     शांता के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। राजा दशरथ को किसी समय किसी ऋषि के श्राप देने पर राजा दशरथ एक सुन्दर स्त्री बन गये थे जिसे कोई राजा अपने साथ ले गया। और वहंां उनको गर्भ हुआ शांता पैदा हुई बाद में शांता की शादी श्रृंगी ऋषि के साथ हुई। श्रापकाल समाप्त होने पर राजा दशरथ पुनःअयोध्या लौट आये।
    यह सर्वविदित है कि राजा दशरथ की 365 रानियां थीं 3 पटरानियां थीं। वे हर वक्त विषय वासना में लिप्त होकर रानियों के साथ ही रहते थे। राज का पूरा कामकाज कैकेयी के हाथ में था। उस समय की प्रथा के अनुसार राजदूत अपनी सेनायें भी साथ लेकर आते थे और कैकेयी ने अपने भाई की सेनायें अयोध्या में रखी थीं और अपने पक्ष के राजदूतों के सेनायें अयोध्या के आसपास के प्रांतों में थी तथा दशरथ की सेनायें दूर दराज सीमाओं पर थीं। शासन पर पूरा अधिकार कैकेयी का था। राजा दशरथ कभी किसी प्रकार की कोई भी दखलंदाजी नहीं कर सकते थे। इस पर राजा दशरथ परेशान थे।
    क्या यह दशरथ का षड़यंत्र नहीं था कि दोपहर को भरत और शत्रुघन अपने ननिहाल जाते हैं और शाम को राजतिलक का मुहूर्त निकाल दिया जाता है। कैकेयी जो कि अति समझदार, होशियार, चालाक औरत थी तुरन्त कार्यवाही  करते हुये राजा दशरथ से अपने दो वर मांग लिये। राजा दशरथ इस पर मुकुर सकते थे परन्तु यह वर गुरू वशिष्ठ और सुमंत जी की मौजूदगी में कैकेयी ने शादी के पहले  राजा दशरथ से मनवा लिये थे।
    ‘‘रघुकुल रीति सदा चलि आई प्राण जाहि पर वचन ना जाई‘‘ ऐसा नहीं है  क्योंकि इतिहास में न तो राम के किसी पूर्वज ने और न ही किसी वंशज ने ऐसी कोई रीति निभाई थी। ये वन जाना राम की मजबूरी थी और इसके सिवाय कोई चारा नहीं था क्योंकि अयोध्या तथा दूर दराज तक कैकेयी के भाई की व अन्य मित्र राजदूतों की सेनायें थीं। राम विद्रोह कर सकते थे तथा  राम के कुछ विश्वस्त सैनिक भी थे। राम के कुछ विशेष शस्त्र निषादराज के पास थे और निषादराज सहायता करने को तैयार था परन्तु इस पर भी राम ने दूरदर्शितापूर्वक यह देखा कि वह कैकेयी के भाई तथा उसके मित्र राजदूतों की सेनाओं के मुकाबले किसी प्रकार जीत नहीं सकता था और हजारों लोग व्यर्थ में मारे जाते। इसलिये उन्होंने वन जाना उचित समझा, कैकेयी अपने रास्ते में कोई रोड़ा नहीं चाहती थी, लक्ष्मण को भी निकाल दिया गया।
    वन जाते समय राम के साथ हजारों अयोध्यावासी गये क्योंकि उनके मन में राम के प्रति आदर विश्वास और श्रद्धा थी परन्तु कुछ दूर जाने पर राम ने उन्हें समझाकर वापस भेज दिया। फिर भी उनके मन में राम के प्रति विश्वास और कैकेयी के प्रति घृणा थी। जिसको दूर करने के लिये कैकेयी ने अपनी रणनीति के आधार पर भरत को साथ लेकर राम को मनाने और अयोध्या वापस लाने का प्रयास किया, परन्तु यह केवल एक औपचारिकता थी और राम ने कैकेयी द्वारा भविष्य में धोखा हो सकता है वापस आने से इंकार कर दिया।  

                                                   


    हनुमान जी जब संजीवनी लेकर आये तो राम जी ने भाव विभोर होकर हनुमान जी को गले लगाया और कहा तुम मम प्रिय भरत सम भाई यहां एक संदेह उठता है क्या भरत भी ऐसे थे। जबकि हनुमान जी ने भरत को यह बता दिया था कि रामजी का रावण के साथ युद्ध चल रहा है व लक्ष्मण मूर्छित पड़े हैं और भरत की सेनायें आंध्रप्रदेश तथा कर्नाटक की सीमाओं पर थीं और भरत राम की सहायता के लिये अपनी सेनायें तुरन्त भेज सकता था। ऐसा उन्हांेंने नहीं किया क्यों - इस पर किसी लेखक ने आज तक कुछ नहीं लिखा।
    अब मैं अपने मूल विषय पर लिखना चाहूंगा
    ब्राम्हण समाज ने अपने अहम अंधविश्वास और स्वार्थवश किसी को कभी कोई शंका करने नहीं दी। आज से तीन हजार साल पहले भारत में केवल वैदिक यानि सनातन धर्म ही था। कुछ समय बाद मजबूरीवश एक हिस्सा यानि बौद्ध अलग हो गया। साथ ही जैन धर्म अलग से चालू हो गया। इसके बाद
1.     जीसिस ने केवल इतना ही कहा था कि ईश्वर एक है हम सब उसकी संतान हैं उन्हें फांसी चढ़ा दिया गया। 
2.    मोहम्मद साहब ने केवल अद्वैत ही कहा था जिसका अर्थ हिन्दी भाषा  में केवल एक ईश्वर ही है और कुछ नहीं। और इसका अर्थ अरबी भाषा में लाइला इलइल्लाह होता है परन्तु उनके साथ भी युद्ध हुआ उनका पूरा परिवार मार दिया गया। जिसके आधार पर आज भी भारत के मुसलमान हिन्दुओं को काफिर कहते हैं।    
    3.    स्वामी दयानन्द जी को वेद प्रचार पर जहर दे दिया गया।
4.    एक साल पहले स्वामी अग्निवेश ने अमरनाथ में हिमलिंग के बारे में यही कहा था कि ये प्राकृतिक प्रक्रिया है तापमान के आधार पर बन जाता है घुल जाता है, उन पर मुदकमा दायर हो गया।
      5.    रामायण में लिखे अनुसार रामचन्द्र जी ने लंका जाने के लिये एक अस्थाई पुल बनाया था जो पानी पर तैरता था ऐसा आज भी संभव है और उदाहरण के लिये कई छोटी नदियों पर ड्रमों के पुल आवागमन के लिये बने हुये हैं और कश्मीर में पानी पर तैरने वाले कुछ खेत भी हैं जिन पर आज भी खेती होती है परन्तु ब्राम्हण समाज जो कि आज संत समाज के नाम से जानी जाती है, का कहा है कि समुद्र के अंदर जो पहाड़ी है वही पुल राम ने बनाया था। यदि उस पहाड़ की मिट्टी अथवा पत्थर का हिसाब लगाया जाये तो ये कई करोड़ टन बैठेगी जो कि राम द्वारा लाये गये पत्थरों और बनाने के समय और 14 वर्ष पूरे होने की अवधि को ध्यान में रखा जाये तो ये असंभव था। परन्तु आज का संत समाज भावनाओं को ठेस पहुंचने के आधार पर अपने अहमवश सेतु समुद्रम परियोजना को पूरा होने नहीं देना चाहता।
    आज इस समाज द्वारा उनके इस व्यवहार से न केवल  वेद लुप्त हो गये हैं अथवा लाइब्रेरी की अलमारी की शोभा बढ़ा रहे हैं बल्कि हिन्दू शब्द भी समाप्त हो रहा है जैसा कि आज की स्थिति में वेद को पढ़ने वाले जो समाज की उन्नति तथा व्यवहारिकता के मूल आधार हैं शायद इस धरती पर कुछ इने गिने लोग रह गये हैं।
    भारत सरकार ने हिन्दू शब्द समाप्त कर दिया है किसी भी प्रकार के सरकारी नौकरी पाने अथवा किसी सरकारी कार्यालय मंे कोई निवेदन लगाने के लिये जो प्रपत्र निर्धारित किये हैं उनमें आदिकाल में बनाये गये चार वर्णों की जगह नये चार वर्ण बना दिये हैं  जो इस प्रकार हैं एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी. और जनरल। समाज की दिशा निर्धारित करने वाले ब्राम्हण (संत) समाज तथा देश की रक्षा करने वाले क्षत्रिय को जनरल क्लास में डाल दिया है वह रेल्वे के जनरल क्लास के डिब्बे में घुसे यात्रियों जैसे धक्के खाते व अपना अपमान सहते हुये समय गुजार रहे हैं। मैं सिर्फ आज की संत समाज और हिन्दुत्व का दावा करने वाले आर.एस.एस. तथा भारतीय जनता पार्टी से यह करबद्ध निवेदन करना चाहता हूं कि वेद और हिन्दू को बचाने का प्रयत्न करें मिट तो चुके ही
हैं।  

                                                                                लाल चन्द्र चड्ढा
                                                                                नोगाव नाका
                                                                                झाँसी रोड
                                                                                 छतरपुर (म.प्र.) 
























एक बार फिर स्वागत है ज़िंदगी के उस मोड़ पर.. जहाँ थमना चाहता है मन.. झुझते हुए जीवन की थकान मिटाने के लिए.. रुकना चाहते हैं कदम कुछ देर सुसताने के लिए.. स्पर्श पाना चाहते हैं हम अपनो का.. स्वयं में विश्वास जगाने के लिए.. किंतु.. मानव मन है.. दिन रात उमंगे भरता रहता है.. भूल जाता है अपने जीवन के कर्तव्य को.. विसर पड़ती है जीवन  चक्की की.. और फिर ज़रूरत पड़ती है अपनी जीवन आवश्यकताओं की.. किंतु..परंतु छोड़ कर फिर ज़िंदगी चल पड़ती है.. सुखी रेत पर.. तपते कदमों के साथ.. एक नये मोड़ की तलाश में.. हाँ मित्रो.. जिंदगी फिर चल पड़ी.. स्वागत है.. जिंदगी के संघर्ष में..
                                                                                                          नीरा