जब जब धरम की हानि होती है और अधरम की वृद्धि होती है तब तब ही मै आपने रूप को रचता हूँ " श्री क्रष्ण भगवान ने ऐसा गीता में कहा है .और यह सच भी है की समाज की विषम परिस्थितिय्नो से प्रेरित हर युग और काल मे कहीं न कहीं कोई संत पुरुष अवतरित हो पर ब्रहम परमेश्वर के सत्य स्वरुप की और धरम की राह दिखता है. निम्नलिखित लेख मे जिन संत पुरुष की जीवनी का उल्लेख है उनका जन्म२४ नवम्बर वर्ष १९०३ मे रावलपिंडी ( पाकिस्तान )जिले के गंगोठिया गाँव के एक ब्राह्मन परिवार मे हुआ था .ये वो समय था जब भारत दासता की जंजीरों मे जकड़ा था और देश मे चारों तरफ अराजकता फैली हुई थी धर्म के नाम पर हिंसा जोर पकड़ रही थी ऐसे समय मे .संत मंगत राम जी ने समता की भावनाओं का प्रचार किया . उनका कहना था की समतावाद भारत की पुरातन अधय्त्मिकता और परम्पराओं की पुष्टि करता हैऔर जिसके आभाव मे अहम् भाव दुखों का मूलभूत कारण बन जाता है .अहंकार ही सबसे बड़ी जड़ता और मुर्खता है .
समता अखंड शांति ,कुल विघन दोष से न्यार 'मंगत 'रूप नारायण का ,तत्त समता विचार .
मंगत राम जी मे बालकों जेसी चंचलता नहीं थी .४ वर्ष की आयु से ही आपने धयान लगाना शुरू कर दिया था .और सातवीं कक्षा मे पहुँचाने तक वे पूर्णतया धयान मे लीन रहने लगे .अभी उनकी अवस्था मात्र १३ वर्ष की ही थी की उन्हें दिव्य अनुभूतियाँ होने लगी .वे पदाई और घर संसार के वयवहार से दूर भागने लगे .गाँव के पास जंगल मे जा कर वे घंटों दत्तचित्त हो कर धयान करते थे . एक बार वे पुरे ४० दिन तक ध्यानावस्था मे रहे और तब अचानक उन्हें आपने अंतर मन मे इतने उज्जवल प्रकाश का अनुभव हुआ मानो कोटि कोटि सूर्य अम्बर पर छा गए हों .ऐसे समय मे उनके अन्तर मन से एक महा मंत्र का प्रादुर्भाव हुआ...
ओं ब्रहम सत्यम ,निरंकार अजन्मा ,अद्वैत पुरुषा,सर्व व्यापक ,कल्याण मूरत पेर्मेश्वराए नमसतं .
यही मंत्र आगे चल कर उनके भक्तों के लिए ब्रह्म सूत्र बन गया .इश्वर की अनुभूति होने पर उन्हें जीवन से विरक्ति होने लगी .पर अब भी वे पाठशाला जाते थे .एक दिन उनकी कक्षा मे एक अंग्रेज इंस्पेक्टर जाँच के लिए आये और अनेक प्रश्नों के बीच विद्यार्थिय्नो से यह पूछा गया की सेवा किसकी करनी चाहिए .मंगत राम जी ने इसका उत्तर देते हुए कहा ----'दुनिया की हर वस्तु सेवा कर रही है ,सेवा करने के लिए ही पैदा हुई है लेकिन मनुष्य सदा स्वारथ के लिए ही सेवा करता है .वो स्वारथ वश ही परिवार व मित्र जनों की सेवा करता है और स्वारथ वश ही इश्वर की भी सेवा करता है इस लिए हमारा सब से बड़ा कर्त्तव्य है की हम सदा निष्काम भाव से ही सेवा करें .सभी महा पुरषों ने सेवा को सब से बड़ा पुण्य का काम माना है.निष्काम सेवा से निष्काम सुख मिलते है जो कभी समाप्त नहीं होते .
श्री मंगत राम जी ने अपनी माँ और शिक्षकों के कहने पर नौकरी तो कर ली पर विवाह करने से इंकार दिया .वेकहते थे संसारी शिक्षा बहुत हो गई अब सच्चा ज्ञान प्राप्त करना है .
पड़ना एको नाम का और पदन दे त्याग
'मंगत'निश्छल चित होवे ,प्रेम हरी रास लाग.
उन्हें कई रिधियाँ सिद्धियाँ प्राप्त हो गई थी पर वे इन सब के प्रदर्शन के विरुद्ध थे.एक बार उनके मित्र जनों मे इस बात पर बहस हो गई की प्रह्लाद को उसके पिता ने कठोड़ से कठोड़.यातनाये दे कर मारना चाहा उसे लोहे के जलते हुए खम्बे से बांधा ऐसी परिस्थितिय्नो मे कोई केसे जीवत बच सकता है ये सब झूठी कहानियां जान पड़ती है.मंगत राम जी ने कहा 'प्रभु के सच्चे भक्त जान बुझ कर कोई चमत्कार नहीं दिखाते और न ही किसी पर अपना प्रभाव डालने के लिए ही ऐसा करते है.सहज स्वाभाव ही या फिर कभी किसी परीक्षा मे पड़ जाते है तो प्रकृति स्वयं ही वहां उपस्थित हो कर उनकी सहायता करती है .'वर्ष १९२९ मे मंगत राम जी की माता का देहांत हो गया .अब वे अपना अधिकतर समय कश्मीर के घने जंगलों मे जा कर तपस्या मे व्यतीत करने लगे .जब कभी उन्हें अवसर मिलता वे लोगों को सेवा और समता का उपदेश देते और उन्हें प्रेरित करने के लिए वार्षिक यज्ञ अवंम सत्संग किया करते थे .रतन दास जी उनके शिष्य थे और सदा उनके साथ रहते थे .आपने श्री मंगत राम जी के मुख से निकले श्लोकों और शिक्षाप्रद उल्लेखों को लिपि बध कर भक्तों तक पहुँचाया.
वर्ष १९४७ मे देश के बटवारे के समय मंगत राम जी भारत आ गए .चरों तरफ फ़ैले हा हा कर को देख कर उन्हों ने कहा ऐसे पहले भी होता आया है .असी घटनाये शिक्षा प्रद होती है .संसार मे अशांति के सिवाय कुछ नहीं .हमें धरम को समझना और धारण करना चाहिए और सदा सबके साथ प्रेम पूर्वक रहना चाहिए .मंगत राम जी क्षमाशीलता मे विश्वास करते थे क्न्योकी वे सब की आत्मा मे प्रभु के दर्शन करते थे.जीवन मे सादगी और निरंतर तपस्या के फलस्वरूप उनहोंने निद्रा, भूखऔर प्यास पर पूरण तया विजय प्राप्त कर ली थी .जीवन पर्यंत रात का समय आपने समाधी मे ही बिताया एक बार आपने भक्तों को चेतावनी देते हुए आपने कहा था 'जब तक तू अपने कल्याण के लिए स्वयंम सोचेगा, समझेगा, मानेगा और उसी के अनुसार आचरण करेगा नहीं तब तक यदि ब्रह्मा भी आ जांए तो वे भी तेरा कुछ नहीं बना सकते .ये शारीर अपूर्ण है इसके भोग अपूर्ण है ,यह संसार अपूर्ण है ,इस अपूर्ण शारीर और अपूर्ण संसार मे पूरनता की आशा करना मुर्खता है .यह बात तू आज समझ ले ,दास साल बाद समझ लेना या चार जनम बाद समझ लेना ,आखिर समझना यही पड़ेगा .कन्यो अपनी यात्रा लम्बी करता है .उठ जाग और अपने कल्याण मार्ग पर आगे बढ चल .मूर्ति पूजा का उल्लेख करते हुए आपने कहा था ' वहीमूर्ति पूजा सुखदाई होती है जिससे उस मूर्ति का आदर्श धारण कर के उन जेसा पुरुशतार्थ प्राप्त करें .' 'सत एक इश्वर है बड़ी से बड़ी कोशिश कर के सत विश्वासी होना चाहिए .'वे कहा करते थे की मनुष्य को हर समय शिक्षा की आवश्यकता होती है .इससे परमात्मा अवंम परमारथ का बोध होता है .उन्होंने समता पर जोर दिया और कहा 'समता स्वरुप असली ब्रह्मा शब्द है जो की हर प्रकार से पूर्ण है और इसका सब के अंतर मन मे व्याप्त होना बहुत जरूरी है .'वे भारत भूमि को सत और समता की कर्म भूमि मानते थे उनका कहना था जब से सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ है इस भूमि पर संत आते रहे है ओउर आते रहेंगे .ये हमारी सांस्कृतिक धरोहर है .बहार के देशों मे तो कुछ समय पहले ही लोग जागे है .भारत के ही श्री विवेकानंद जी और श्री रामतीर्थ जेसे महा पुरुष विदेशों मे गए औरलोगों को कुछ जागृत कर आत्म विद्या का स्वरुप बताया .
इस तरह जीवन पर्यंत वे लोगों की निस्वार्थ सेवा कर उन्हें समता का उपदेश देते रहे और सदा इस पथ पर चलने काआग्रह करते रहे .४ फरवरी १९५४ को आपने अमृतसर मे महासमाधि ली .आप के भक्तों की संख्या बहुत अधिक नहीं है पर जो भी है उनके घरों मे आज भी बड़ों की सेवा और निष्काम सेवा भाव अपार रूप मे देखा जा सकता है.देहरादून के निकट पहाड़ों पर घने जंगलों के बीच मंगत राम जीका आश्रम है जहाँ भक्त गन तप एवं साधना के लिए जाते रहते है .
समता अखंड शांति ,कुल विहीन दोख से नयार.
'मंगत रूप नारायण का ,तत्त समता विचार .

