शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

पाठशाला

         
                                      

   पाठशाला एक ऐसी जगह है जहाँ तरह तरह के लोगों से मिलने का अवसर मिलता है ,रोज एक नया दिन रोज एक नई  कहानी। दसवीं कक्षा कि बोर्ड कि परीक्षा शुरू होने अभी कुछ ही दिन बाकि थे ,विद्यर्थिंयो को प्रवेश पत्र मिल चुके थे और चारों तरफ एक हलचल सी थे। हमारी पाठशाला में २५० बच्चे परीक्षा लिखने वाले थे। आज कल बच्चे ऐसे समय मे भी बहुत लापरवाह होते है। कभी कभी बहुत आश्चर्य होता है क्या इस देश का भविष्य मात्र पिज़्ज़ा और बर्गर बन कर रह जायेगा। उधर माता पिता जिन्होंने पिछले ६ वर्षों से बच्चे कि परवाह नहीं कि बोर्ड कि परीक्षा के समय अचानक से जागरूक हो जाते है। बच्चों कि छोटी से छोटी सुविधा का ध्यान रखते है। पर ऐसे बहुत कम लोग है जिनको पढ़ाई का धयान हो। ठीक भी है इसमें माता पिता कर भी क्या सकते है। ऐसे समय मई बड़ी कठिनाई से वे अपना कुछ कीमती समय निकल कर स्कूल आते हैं। अब सुनिये कि उन्हें काया चिंता सताती है.…परीक्षा शुरू होने से आठ दस दिन पहले से ही उनका पाठशाला आना जाना शुरू हो जाता है उनके चेहरे पे चिंता भी होती है क्य़ोंकि किसी ज़माने में उन्होंने भी ये परीक्षा बहुत ही तनावपूर्ण परिस्तिथिंयो में लिखी थी। "जी हम बस देखने ए थे कि सेंटर केसा है " ऑफिस में खड़े हो क्र पूछेंगे "क्या आपके स्कूल का नाम>>>>यही है " संदेह होता है बिना हमारा पता जाने ये यहाँ तक पहुंचे केसे और जवाब में हम उनकी तरफ देखते रहते है। "कितने कमरे है स्कूल में ' "क्या कमरों में पंखे लगे हैं। " "यदि आप बुरा न मने तो हम कमरे देख सकते है। " "आज कल पावर कट बहुत हो रही है क्या आप के पास जेनरेटर है। " "कमरे में पर्याप्त रौशनी है कि नहीं " "क्या तुबे लाइट चालू रखेंगे " "पानी का स्कूल में  क्या प्रबंध है , कोई पिलाने वाला है कि नहीं। "यहाँ तक तो और पूछताछ कुछ सही लगती है पर वे बच्चे जिन्होंने साल भर खूब मस्ती की ,जिनके माँ बाप ने उन्हें सदा इस बात का भरोसा दिलाया कि "तू चिंता मत कर सेंटर कोई भी रहने दो अपनी जानपहचान बहुत ऊपर तक है " इस ऊपर कि जानपहचान वाले इन बच्चों को उनके ही  माँ बाप  हकीकत से बहुत दूर कर देते है । ये सब बिना जड़ों के पौधे कि तरह पनपने वाला एक समुदाय है। ये वो बच्चे है जो आप को हर गली चोराहे और नुक्कड़ पर  देखने को मिलते है ,एक बाइक पर चार  चार ,पांच पांच सवार  मस्ती करते दिखते  है कभी सिगरेट फूंकते और कभी बात बात पर दूसरों से कूद कूद कर  झगड़ते दिख जाते है छोटे बड़े का लिहाज ये नहीं जानते। सीना घरों कि दीवारों और गलियारो में थूकना बात बे बात शान बघारना इनकी आधुनिकता कि पहचान है। बस आज का दिन है ---आज ही पूरा जीवन जीना है फिर कल पता नहीं हो न हो। मस्ती आज ही करनी कल पता नहीं कौन सी गाज गिर जाये। आज ही जवानी का जोश है ----जो चाहे कर लो ,कल सहानुभूति के चलते कैंडल मार्च निकाल  लेंगे अगले दिन फिर अपनी धुन अपनी मस्ती। संस्कारो को पैरों टेल रौंद क्र आगे बड़ रही इस विचारहीन  पीढ़ी को उनके तथाकथित नेतायों और 'भाई 'समाज का ही सहारा है। यहाँ पर इज्जत का सवाल ये है कि यदि दसवीं कक्षा भी पास न कर  सके तो शर्म कि बात होगी ,लोग निंदा करेंगे ताने देंगे "अरे इतनी ऊपर तक पहुंच है फिर भी दसवीं कक्षा पास न कर सके "अब ऐसे में स्कूलों पर भी दबाव पड़ता है।
                              

  परीक्षा से कोई दो दिन पहले एक सज्ज्न तीन रंग का तिलक लगाये दस ग्राम चमेली के तेल से बालों को संवारे अपने खादी  के कुर्ते पर पड़ी सिलवटों को सहलाते मेरे कार्यालय में सकुचाते हुए आये। मुझे लगा कोई केंद्र के बारे में जानकारी लेने आया है। मुस्कुरा कर उनका स्वागत कर उनको बैठने का संकेत  किया। "जी मेरे बच्चे कि दसवीं कि परीक्षा का सेंटर आपके स्कूल में पड़ा है ,आप लोग बच्चों के साथ बहुत सख्ती तो नहीं करते। "मेरा माथा ठनका  पूछा "जी मैं  समझी नहीं " "बात यह है कि हमारा बच्चा देशीय स्टार का खिलाडी है और अभी हाल ही मे प्रतियोगिता जीत कर लोटा है --------उसने पूरी तरह से परीक्षा कि तैयारी नहीं कि ---हैम चाहते थे कि -----जी वो कार्यरत नेता जी का बीटा है -----अब आप तो जानते ही है --समझ सकते है ---मुझे  बोलने का कोई मौका ही नहीं दिया जा रहा था ,इससे पहले वे मुझे मजबूर करने का कि कोशिश करते या कुछ और कहते और मै उनको साफ शब्दों मे इंकार करती और सदा के लिए नाराज कर  देती ---उनसे पीछा छुड़ाने के लिए मेने उन्हें पाठ शाला कि अध्यक्षा के कक्ष कि ओर इशारा कर दिया जहाँ उनको उनकी ही मातृ भाषा में अच्छी तरह समझा दिया जायेगा। अभी वे अंदर गए ही थे कि एक और खद्दर धारी प्रगट हुए। एक सैल पर बतिया रहे थे और दो सैल दूसरे हाथ में पकडे हुए थे ,दनदनाते हुए सीधे अध्यक्षा के कमरे मे घुस गए। सरे देश का भर जिन के सिर पर हो उनका पल पल कीमती होता है  तीन चार मिनट का इंतजार भी भारी लगता है और उनसे भी ज्यादा बेचैन हो रहे थे उनके हट्टे कट्टे बंदूकधारी  अंगरक्षक। नेतायों को किसी का इंतजार करने कि आदत तो होती  नहीं -----लोगों को ही घंटों उनका इंतजार करने की मजबूरी होती है ,

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