गुरुवार, 22 सितंबर 2011

नो की गाड़ी... संस्मरण

    नो  की  गाड़ी 



                                      
                          जीवन मै एक्शन रिप्ले हो जाता है जब कभी बरसों पहले बीते पलों को फिर से जी लेते है .पचास --पचपन दशक तो बीत गए होंगे उन दिनों  मै अपने माता पिता के साथ मध्य  प्रदेश के एक छोटे से गाँवt मै रहती थी .३ से ४ हजार की आबादी वाले उस गाँव की प्रतिष्ठा बहुत थी जिसके दो मुख्या कारण थे ---पहला यहाँ पर अनाज का बहुत पड़े पैमाने पर अनाज का क्रय विक्रय होता था और दूसरा यहाँ पर रेलवे स्टेशन था .गाँव के सारे कम काज घरेलु हों या वयपारी सब इन रेलगाड़ियों के आने जाने पर टिके थे .समय यानि गाड़ी आ गई है या अभी नहीं .                                      "अभी तक पेपर नहीं आया लगता है नो  की गाड़ी लेट लगती है .'  " माँ जल्दी जल्दी काम करती लल्लू को डांट रही है "अरे जल्दी से तयार हो कर स्कूल जाओ नो की गाड़ी कब की निकल गई .पिटोगे आज मास्टरजी से ."  "का हुआ मातें आज पानी लाये मै बड़ी देर हो गई .-----देर कां हुई बाई जी  अबैं तो नो की गाड़ी कड़ी ."---"पंडित जी कल की सत्य नारायण की पूजा टेम पर सुरु हो जानी चाहिए सब को बोल के रखा है गाड़ी निकलते ही आ जाएँ ."------"डाक्टर  साहब पेट मै बहुत दरद है कल दिन भर कुछो नईखाए .बस गाड़ी कड़ी तब पूरी भाजी खाए थे ."----डाक्टर ने सुई लगा दी ओउर कहा अभी तो दर्द की सुई लगा दी है जब रात को गाड़ी कड़े तो ये एक गोली खा लेना और सुबह गाड़ी कड़ने पे दूसरी ....."
                                              छोटे गाँव के अपने मजे होते है .गाड़ी स्टेसन पे कड़ी है और चौबे जी का लठेत दृवार को कहता है "भैया ठाकुर जी के घर से बाई जी आ राइ है ताना गाड़ी रोके रखियो ."क्या मजाल की गाड़ी चल पड़े  बाई जी हठ भर का लम्बा घुंगट निकले आराम से चल कर आती है फिर उनका सामान अन्दर रखा जाता है फिर अन्दर बेद्थी सवारियों को हटा कर जगह बनाई जाती है "ताना सरक जाओ भइया जानना सवारी है "अगर जरा सी भी किसी ने न नुकर की "कई न की चोबे जी के घर की बाई जी है"
                                                        

                   झाँसी स्टशन पर गेट से अन्दर घुसते ही बाएँ और एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ है ,जिसके नीचे पटरी के अंतिम छोर से सटी ये मानिकपुर पसेंजेर गाड़ी कड़ी होती है आना हो या जाना .हम दिल्ली से लोट कर इंतजार मै बेठे होते कब गाड़ी वहां आये और हम बेठे .गाड़ी छुटने के निर्धारित समय से दो घंटे ये गाड़ी प्लेटफार्म पर आ जाती और हम उसमे जा बैठते,सवाल था देर हो जाने पर कहीं सीट न घिर जाये इधर गाड़ी मै भीड़ इकठी होनी शुरू होती उधर बरगद के पेड़ पर चिड़ियाँ .सारा प्लेटफार्म चिड़ियों के चें चें से गूंजने लगता .धीरे धीरे भीड़ इतनी बाद जाती की लोग दरवजे और खिड़की का भेद भूल जाते .(उन दिनों खिड़की पर लोहे के सरिये नहीं होते थे )एक के बाद एक पोटलियाँ और बच्चे खिड़की के रास्ते से अन्दर फेंके जाते .अगर किसी आस पास के गाँव मै हाट या मेला लगा होता ,तब तो हाथ भर का लम्बा घूँघट डाले महिलाओं को भी खिड़की के रास्ते अन्दर डाल दिया जाता इतना ही नहीं पीछे आवाजें भी आतीं अरे जल्दी से सीट घेर लो नई तो बेठे की जगह न मिलेगी .गाड़ी चलते न चलते तिल भर जगह भी न बची होती .झाँसी से जब गाड़ी चलती तो गर्मी और धक्का मुक्की से बचने के लिए बाहर खड़े लोगों की भीड़ एक दम डिब्बे मै भर जाती उस समय ऐसा लगता मनो भूचाल आ गया है ."अरे हमाई सीट पे तुम केसे बेथ गए भैया "  खाली हती तो बेठ गए"--"खाली केसे हती हम अपना गमछा रख के गए थे अपनी सीट पे "अब जो एक बार बेठ गया वो बेठ गया गमछे की ऐसी की तेसी .सीट को ले कर बड़ी देर कहा सुनी होती .बीच बचाव किया जाता थोड़ी देर मै सब शांत हो जाता .टाइम पास के लिए मूंगफली खाई जाती .इतनी भीड़ मै भी मूंगफली बेचने वाले बड़ी सफाई से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाते.ये जो जरा देर पहले सीटों के लिए इतना झगड़ रहे थे की कहो अभी एक दूसरे का सर फोड़ देंगे पे अब आड़ेतिरछे हो कर हर आने आजने वालों को रास्ता भी दे रहे और बोल बतिया भी रहे थे .गाड़ी मै पहले से ही मूंगफली के छिलकों की तह अब कुछ और मोती हो जाती .इस गाड़ी की एक खास बात यह थी की इसमें बिजली पानी नाम की कोई सुविधा नहीं थी और सफाई से सख्त दूरी बनी रहती थी .
                                बरुसागर स्टशन पर अदरक बहुत अच्छीऔर सस्ती मिलती थी .गाड़ी रुकते ही माँ अदरक खरीदने लगती ओउर मेरे पिता जी बरुआसागर  की पुरी भाजी लेने चले जाते यहाँ की .पुरी भाजी खाए  बिना तो हमारी यात्रा अधूरी ही रहती थी.समोसे और पुरी भाजी का स्वाद तो आज भी यद् आने मुंह मै पानी आ जाता है .माँ और पिता जी के वापिस आने तक मै सीमा पर तेनात की तरह सीटों की रक्षा करती ''वहीँ की भाषा मै हर आने वाले को कहती की ''भैया एते नई उते बेठो जे सीट तो घिरी है ''पर माना करने पर भी कुछ हिस्सा तो सीट का घिर ही जाता था. गाड़ी जंयों जय्नो अगले स्टशन  पर रूकती जाती भीड़ भी कम होती जाती .
                                              एक बार एसा भी हुआ --मौरानीपुर आते आते डिब्बा काफी खाली हो चूका था .उन दिनों डिब्बे के बीचों बीच एक लम्ब्बी सीट होती थी यानि कुल चार लम्बी सीटे होती थी .मौरानीपुर का स्टशन छोड़ने का सिग्नल हो गया था की भड भड़ती हुई ४ --५ महिलाएं १०--१२ बच्चों के साथ डिब्बे मै आ घुसीं .ताबड़ तोड़ सामान डिब्बे मै फेंका जाने लगा .बिस्तर और बक्सों की धक्का पेल मै बर्तनों की खड़ खड़ भी सुनी जा सकती थी .सबके अंदर पहुँचते न पहुँचते गाड़ी चल पड़ी .पीछे से सुना ''रज्जू की माँ पहुँचते ही ख़त लिख देना और छन्नू  को हाकिम को दिखाना न  भूलना .और अम्मी को tel  दे  देना ............''
गाड़ी dur निकल  aai थी .हम सब गाड़ी के डिब्बे मै एक taraf simat  गए और दूसरी taraf  बच्चों की  धामा  चोकड़ी  के बीच स्टोव जलने  की अवाजें  सुनी दी .और जरा सी देर मै पूरा  डिब्बा मसालों  और मांस   के भुने  जाने की गंध  से भर गया .खाना  बनता  रहा  बच्चे सो गए  और हम अपना गाँव आने पर अँधेरे मै संभल संभल कर उतर गए . ४५ साल बाद रत के दो बजे मै झाँसी स्टेशन पर खड़ी थी मुझे पहले से आगाह कर दिया गया था उस दिन उत्तर प्रदेश और मद्द्य प्रदेश मै चुनाव होने के कारण राजन्यो की सीमा पर आवागमन रद्द कर दिया गया था.अब ऐसी हालत मै मेरे पास एक ही विकल्प था'' नो की गाड़ी '' ये गाड़ी झाँसी से सुबह ७ बजे  के आस पास निकलती थी .बची खुची रत मैंने विश्राम घर मै काटी.और सुबह ६ बजे मै मानिकपुर पस्सेंगेर पकड़ने निकल पड़ी
                       

           सोच रही थी अभी गाड़ी निकलने मै एक घंटा है  बताने की जगह तो मिल सकती है.पर राज्य्नो की सीमा पर प्रतिबंद के कारण जितनी भीड़ गाड़ी के बहार थी उतनी ही अन्दर भी ठसा ठस भरी थी .मने गाड़ी की लम्बाई दो बार नपी लग रहा था किसी बिछड़ी सखी से मिल रही हूँ.फिर धीरे से हिम्मत जूता कर एक डिब्बे मै घुस गई .सामान साथ मै न के बराबर था एस लिए हिम्मत बंधी हुई थी .पुरे डिब्बे मै नजर घुमाई सीटें तो कई खली थी पे उन सब पर रुमाल,अख़बार और गमछों का आधिपत्य फेला हुआ था .मै भुत असमंजस मै खड़ी थी की सुने पड़ा ''माता जी आप तो इतनी बेथ जाओ जे अख़बार हमें दे दो '' मेने प्रश्न भरी निगाह से उसकी तरफ देखा ----''अरे आप तो बेथ जाओ इत्मिनान से और जड़ी कोऊ आइये तो हम निपट लें  अरे भी तब की तब से देखें  का नै तो ---आप तो बेठ जयो  .और गाड़ी चलने से पहले ही वो सीट मुझे सादर समर्पित कर दी गई.हमारी सभ्यता गांव मै आज भी जीवित थी .एक दो ने बड़े दार्शनिक अंदाज मै कहा ''अरे भी कछु देर की इ तो बात है बेठो बाई जी तुम तो इत्मिनान से बेठो.मै मुस्कुराये बिना न राह सकी .गाड़ी मै आज भी पानी बिजली नहीं थी पर मूंगफली केछिलके आज भी पेरों के नीचे बरकरार थे .वेसे ही बेतार्तेब रखे सामान पर बेतरतीब ढंग से लोग बेठे थे .पर लोगों मै आज  भी एक दूसरे के लिए वेसी ही हमदर्दी थी. हाँ कुछ बदला था तो उनका पहनावा .धोती कुरते की जगह रंग बिरंगी जींस और शर्ट ने ले ली थी हाथों मै cellphone  आँखों पर लेबल लगा चश्मा,और मुं मै गुटका  .महिलाओं ने चमकीली चमकदार साड़ियाँ पहन रखी थी.घूँघट तो लगभग नदारद था .
गाड़ी चली बरुसागर भी आया .वो पुरी भाजी समोसे  की दुकान आज भी वहीँ थी मुहं मै पानी आ रहा था पर मै अपनी जगह से उठी नहीं ---सीट घिर जाने का डर था पर आज स्टेशन  दर स्टेशन भीड़ बदती जा रही थी -----देश की बदती आबादी का एक छोटा सा नमूना .-------नदी नाले पहाड़ गाँव बस्तियां  सब वेसे ही थे मन और आंखे भर आई.और नौ बजे मै अपने गाँव उतर कर बस पकड़ने आगे बढ गई.
                                                                 नीरा भसीन

जननी तुम कहाँ हो ??

जननी तुम कहाँ हो








                         माँ बाप धन्य हुए जब बेटी की शादी
                 एक आई -टी इंजिनीयर के साथ  हुई

                 लाडों में पली ,नाजों मे ढली
                 घर की रोनक आज पराई हुई

   माँ ने दान दहेज़ दे कर बेटी को ससुराल बिदा किया था ,

                  सास ने आशीर्वादों के साथ अपना बेटा दे कर

                   घर की लक्ष्मी को परदेस विदा कर दिया
              नया घर ,नयी  जिंदगी ,ओउर हुआ एक नया सवेरा ,

                  

                 "उठो जल्दी करो ,नाश्ता दो काम पर जाना है "
                  कल तक जब भी सबेरा हुआ तो माँ ने कहा था
                   चल बिटिया जल्दी से नाश्ता कर ले
                    नहीं तो ठंडा हो जायेगा .........


                                                                         जननी तुम कहाँ हो

                     अभी कल की ही तो बात है
       अलमारी मे ठूंस ठूंस कर भरे कपडे देख कहा करती थी
                   "माँ क्या पहनू कुछ भी ढंग का नहीं है "
                    आज डिब्बों मे मिर्च मसाले ढूंड रही हूँ 


                                        


   जननी तुम कहाँ हो

                    वो दिन कितने सुहाने थे
                    जब जी चाह तब सो कर उठते थे ,
                    मन ने जो चाह जिद कर के पा लेते थे
                    पर वो सब कल की बातें है

                    अब बिखरे पेपर ,चाय के खाली  कप
                   बेतरतीब पड़े स्लीपर और भीगा तोलिया
               घर मे बिखरे पड़े हैं -----ये क्या मुसीबत है?


                                                       जननी तुम कहाँ हो --------?

                    आज मेरे अ न्दर भी एक जीवन पल रहा है
                    मुझे याद आती है तुम्हारी वो मुस्कराहट
                     जो सदा मुझे कुछ सिखा जाती थी
                    याद आता है तेरा  वो स्पर्श जो सदा
                     मेरा हौसला बड़ा जाता था
                                                  

                               कल मै भी जननी कहलाऊंगी
                               पर मेरी जननी तुम कहाँ हो 


                     
                          जीवन ऐसे ही आगे बढता है .
                          पर परिवार तो बिखर ही रहे हैं
                          फिर भी जननी तुम धन्य हो..
                           सभी रिश्तों से भिन्न हो..
      बिखरते   परिवारों को जोड़ने का तुम्हारा  काम जारी है.. 
                    हाँ जननी इसी का नाम तो नारी है..
                                                                                                            
                                                                           नीरा भसीन

सोमवार, 22 अगस्त 2011

प्रतीक्षा

                         श्री कृष्ण जन्मास्टमी की सभी को हार्दिक शुभ कामना ..
                                  नन्द के आनंद भयो जय बाल गोपाल की..

                                    

                         

                                                                  प्रतीक्षा
                                           

                                        हजारों  आखें  बिछाये  वो राह तक रही थी
                           अब   मेरे घर बालगोपाल जनम लेंगे ,
                           वो मंगल मन रही थी
                              गुदगुदाती कुनमुनाती रातों के तारों के बीच
                              वो मन्नतें मांग रही थी
                              आज गहरी उमड़ती सांसों के  बीच ,
                               
                         ललाट पे उमड़ते जल कणों को ,
                         वो बार -बार अपने आँचल मे संजो रही थी .
                         नारी  ने ही नारी को जनम दिया ,
                         अब वो अपना दरद छुपा रही थी.

                                                                            नीरा भसीन

रविवार, 14 अगस्त 2011

स्वतंत्रता दिवस ---------चौसथवीं सालगिरह

    स्वतंत्रता दिवस ------  चौसथवीं  सालगिरह




 
                                देश को स्वतंत्रता प्राप्त किये आज ६४ वर्ष हो गए है, हम सब कहते है देश आजाद हुआ था पर किससे  किन बन्धनों से .क्या ये किसी दूसरे  देश के बंधन थे ,दूसरे  देश का कानून था ,दूसरे  देश की भाषा थी,या  दूसरे देश की शिक्षा पद्धति ,दुसरे देश का धरम था या दूसरे देश का खान पान  ओउर वयवहार था,या दूसरे  देश की नित नयी खोज थी ,दूसरे देश की चमक दमक थी या फिर दूसरे देश की लाठी की मार  थी जो हर भारत वासी की आत्मा को दबोचे जा रही थी .इन सब बातों  का जवाब देना आसन नहीं है -- इतिहास के उन पन्नो को खोलेंगे तो समझेंगे की हमारी भारत भूमि विदेशी सत्ता के बीज बोने के लिए इतनी उपजाऊ कन्योकर  सिद्ध हुई --ऐसा  क्या था जो बाहरी ताकतों को आकर्षित कर रहा था .ये पहली बार तो था नहीं की देश पर विदेशी ताकतों ने हमला किया हो .पर जब जब  हमला हुआ तो वो बस लूट पट तक ही सीमित था   .

                    
 विदेशी आते आक्रमण करते धन संपदा लूटते  और अपने देश लौट जाते ,कारण था देश वासियों का ऐसे समय पर एक जुट हो जाना .और  इसका कारन था की भिन्न भिन्न भाषाओँ के चलते भारत की सभ्यता , संस्कृति  और धरम एक ही था .पर धीरे 2लालच की काली छाया  ने अपना रंग जमाया,हमारी आत्म शक्ति का हनन होने लगा और आत्म विश्वास डगमगाने लगा   ,शिक्षा कुछ मुठी भर लोगों की  दासी हो गई .अब जिन लोगों के हाथों मै सत्ता थी उनका लालच बदने लगा .  गरीब और गरीबी ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गई .लोगों ने आजादी को मन वचन और करम से लूटना शुरू कर दिया हर व्यक्ति वो राजनेता हो ,हरिजन,परिजन्य  या फिर विप्रजन हो  सभी एक ही राह पर बढ   चले .

सन १९४७ मै जब देश आजादी की और धीरे धीरे बढ रहा था  तब  कुछ वरिष्ट  नेताओं का यह मानना था की मशीने ,कारखाने और तकनिकी ज्ञान जो पश्चिम देशों से भारत मै आ चूका है वही कल के सुनहरे भारत का आधार होगा और हुआ भी --पर इस ओर बड़ते कदमों ने सही रास्ते  पर चल कर अपनी मंजिल नहीं चुनी .लोगों ने देश को स्वतंत्रता दिलाने मै जो कष्ट उठाये थे और जान मॉल की हानि  को झेला था अब उसकी भर पाई चुकाने का समय आ गया था .गरीब जो सदा से गरीब थे वो तब भी गरीब थे और आज भी गरीब ही है पहले भी उनका शोषण होता था आज भी होता है.चारों तरफ एक होड़ सी मच गई.धन के कई रूप प्रगट होने लगे  काला धन सफ़ेद धन ,मेहनत  का धन ,ज्ञान का धन,लूट का धन,चोरी का धन भ्रष्टाचार का धन ,ज्ञान का धन,पसीने से तर-बतर धन मेरा धन तुम्हारा धन ---पर सुख के सब साधन बटोर कर भी ,देश मै उन्नति का हर द्वार खुलने पर भी देश जितना पहले निर्धन था उतना ही आज भी निर्धन है  .आज अन्ना हजारे या उन जेसे और लोग जो अब  काले धन की और भ्रष्टाचार की गुहार लगा रहे है  तब ये लोग कहाँ थे जब लोगों ने पहले पहल  भ्रष्टाचार की ओर  अपने कदम बदये थे .अन्ना ने अपनी जवानी से ले कर बुदापे तक का समय क्या भ्रष्टाचार का चल चित्र देखने मै बिता दिया ओर जब देश पूरी तरह से इस काली आंधी मै घिर चूका है तो ये दो गज जमीं अनशन करने के लिए मांग रहे है .अपनी जवानी मै अगर जवानों को यह राह  दिखाई होती तो आज आगे कुंयाँ  और पीछे खाई न होती .या फिर यह सब मिडिया की चमक दमक है .

                   
बात कोई भी हो पर उसे सरकार से मनवाने का ये क्या तरीका है की आप सारे देश मै अपनी  मनमानी करते फिर रहे है जलूस निकले जा रहे है रास्ता रोको या अनशन के नाम पर भीड़ जुटाई   जा रही है और इस सब के चलते आम आदमी के जीवन मै जो परेशानिया आती है उन सबको नजर अंदाज कर दिया जाता है .वे मजदूर जो दिन भर कड़ी मेहनत कर शाम की रोटी का इंतजाम करते है उनको सच पूछा जाये तो भ्रष्टाचर का अर्थ भी नहीं मालूम  वे सब जलसों और हर्तालों के चलते अपनी मजदूरी खो बैठते है  ऐसे  मै उनकी भूख का जिम्मेदार कौन है इनके बच्चों की अधूरी शिक्षा का जिम्मेदार कौन है .ये वो लोग है जिनको जीवन के सुख दुःख से कोई सरोकार नहीं बस दो वक्त की रोटी मिल जाये .पर इनका उपयोग नेता अपनी आवाज बुलंद करने के लिए करते है और कहने को उनकी भलाई के लिए कर रहे है ऐसा दावा  भी करते है.संविधान मै समय के साथ बदलाव जरूरी  है पर क्या  ये सब मात्र शोर मचाने से ही हासिल कर सकते है.क्या आम आदमी को आगे भी येही सब सहना होगा . ऐसे दिशा विहीन लोगों की तरफ देखती हूँ  तो लगता है मानो ये मनुष्य नहीं है भीड़ छट जाने के बाद  खाली पंडाल में इधर उधर बिखरी पड़ी कुर्सियां है .
                 
                                                ..नीरा भसीन

रविवार, 7 अगस्त 2011

मित्रता दिवस

                                             मित्रता  दिवस
          
                 

       आज ७ अगस्त है .अंतर राष्ट्रीय मित्रता दिवस .रीति  नै ही सही पर ऐसे दिवस जिन्हें हम मदर'स  डे या फादर'स डे के नाम से जानते है  उनका आज के समाज मे एक महत्वपूरण  स्थान है .युगों से चली आ रही वो प्रथाएं जिन्हें हम युगों से मानते आ रहे है और असंख्य युग पुरुषों के नाम से मनाते आ रहे है ,धीरे धीरे अब वो दृष्टिकोण बदल रहा है . हमारे विचार जितनी तेजी से संकुचित हो रहे है उतनी ही तेजी से हम अपने आस पास के जीवन मे ही खुशियाँ तलाश करने लगे है .दीवाली दशहरे  ,गणेश चतुर्थी या जनम अष्टमी का त्यौहार हो कभी पूरा समाज एक साथ मिल कर मनाया करता था .सभी लोग एक स्थान पर एकत्रित होते थे ओर उस अवसर विशेष के महत्व की चरता करते थे .सांस्कृतिक मूल्यों एवं संस्कारों अदन प्रदान कर मानवीय संबंधों को मजबूत बनाते थे .येही त्यौहार आज भी मनाये जाते है पूजा के नाम पर ढेरों चंदा इकठा किया जाता है .इस  आडम्बर की होड़ का लुत्फ़ भी लोग मजे ले ले कर उठाते है ,पर श्रधा कहीं नहीं दिखाई देती .एक दुसरे की होड़ मे त्योहारों का आयोजन होता है .पूजा के समाप्त हो जाने पर कचरे के ढेर गली कुचों मे बिखरे लोगों की श्रधा को श्रधांजलि  दे रहे होते है .क्योंकि बीती रात आयोजित समिति के लोग अपनी थकन मिटने के लिए कुछ और ही आयोजन कर किसी कवी की कल्पना की कल्पना को सच कर रहे होते है "बीती ताहि बिसर दे आगे की सुध ले"..
                                         
 बात देसी चलन की हो या विदेशी चलन की उद्येश तो सबका एक ही है भाई चारे की भावना मदर'स डे  किस तरह  या फिर मित्रता दिवस मकसद तो ये है की किस तरह आपसी संबंधो को बाद्य जाये और पारिवारिक एकता को कायम रखा जाये .भारत मे भाई दूज हो या राखी ऐसे ही संबंधो की एक कड़ी है इसके पीछे की भावना भी पारिवारिक सम्बन्ध ही है .एक लड़की विवाह के बाद जब अपनी घर गृहस्थी मे व्यस्त हो जाती है अपने जीवन की ऊँची नीची राहों को पर करती अपने आप को पित्र गृह से जोड़े रखती है उसके पीछे ये बंधन ही है जहाँ पिता और भाइयों के सस्नेह आश्वासन ने सदा ही सुरक्षित  रखा है .एक दुसरे के लिए शुभ कामनाएं परिवार के संबंधों को मजबूत  बनाती है.


यदि ऐसे मे हम भी कुछ नए अवसरों को भारत मे ले आये है तो इसे विदेशियों की नक़ल आदि कह कर अपने को छोटा नहीं बनाना चाहिए .इससे तो समाज मे खुशियाँ बड़ाई व बांटी जा सकती है..


 

                               
 'मित्रता दिवस' मेरे  विचार से बहुत महत्व पूर्ण दिन है .मित्रता दो आम लोगों के बीच ही नहीं  पति पत्नी ,माँ बेटी ,पिता पुत्र बहनों बहनों मे,भाई भाई मे या फिर एक देश से दुसरे देश की ,भी तो हो सकती है .एक बात और धयान देने योग्य है हम जो भी दिन मानते है या किसी दिवस विशेष पर रिश्तों को मान  सम्मान देते है वो सब किसी धरम विशेष का बंधन नहीं होता है वो एक भावुक बंधन है कियोंकि ये तो मन के बधन है .बस जरुरत है तो एक नई सोच को अपनाने की ,जिंदगी को जिंदगी के साथ जीने की .ये भावनाए हमारी है आपकी है  हम सब की है 


                  क्योंकि यही बंधन तो जीने का सहारा है..
                                                             नीरा भसीन
                                                                                                                                                          

४० साल पहले उत्तर प्रदेश की तुक बंदी...

४० साल पहले उत्तर प्रदेश की तुक बंदी...





 

रविवार, 24 जुलाई 2011

हमारी युवा पीड़ी..

  हमारी युवा पीड़ी..


                जनम से ले कर मृत्यु तक मनुष्य कई अवस्थाओं से गुजरता है और उसकी हर अवस्था का एक दायित्व होता है जिसका उसे निर्वाह भी करना होता है. ये दायित्व   हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है जिसमे देश कालऔर स्थान के हिसाब से परिवर्तन होते रहते है .पर उनके मूल  भाव सदा एक से रहते है .इन  दायित्वों  के पालन से ही परिवार ,समाज ,गाँव ,शहर देश और यहाँ तक की पूरा विश्व सुचारू  रूप से चलता है .



                                                     ज्यों ज्यों विदेशी ताकतें भारत मे अपने पाँव जमाती गईं त्यों त्यों भारत वासी धार्मिक,शैक्षिक और राजकीय त्रासता का शिकार होते गए .ये सब पलक झपकते नहीं हुआ अपितु इस प्रक्रिया मे सेकड़ों वर्ष लग गए.भारतवासी अपनी संस्कृति अपना धर्म,अपने रहन सहन अपनी भाषा, अपना विवेक और यहाँ तक की अपने खान पान को भी भूल कर श्री हीन हो गए थे .तब देश को विदेशी सत्ता के हाथों से निकलने के लिए सारे देश के युवा  जाति पाति ,भाषा और प्रांतीय मतभेदों को भुला कर एक जुट हो कर स्वतंत्रता संग्राम मे शहीद हो रहे थे .इन्ही दिनों स्वामी विवेकानंद ,राजा राम मोहन रॉय और स्वामी दयानंद जेसे महान पुरषों ने उन्हें भारत की मूल संस्कृति व वेदांत के दर्शन कराये .कवियों की लेखनी भी पीछे नहीं रही .तुलसीदास कृत रामचरित मानस घर घर पड़ी और गाई जाने लगी.ऐसे ही अन्य ग्रन्थ दूसरी भाषाओँ मे भी लिखे गए जिससे देश के कोने कोने के युवा प्रदीप्त हो उठे.देश स्वतंत्र हुआ पर यह केसा परिवर्तन था  जिसमे युवाओं के होश खो गए .सांस्कृतिक धरोहर कुछ मुठी  भर लोगों के हाथ मे रह गई बाकि लोग विकास के नाम पर विनाश की ओर चल पड़े. आज जितने युवा लोगों की भीड़ बिन बुलाये जुआ घरों मे ,सिनेमा घरों मे ओर शराब की दुकानों मे दिखाई देती है उतनी बुलाने पर भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों ,समारोहों ,या  समाज के उत्थान के कार्यक्रमों मे नहीं दिखाई देती.शिक्षा भी केवल भौतिक सुखों को जुटाने का साधन मात्र रह गई है.हमें बैठकों या चोरहों पर खड़े हो कर सत्ता को दोष मात्र देने से कर्त्तव्य मुक्ति नहीं मिल सकती.हमें बुराई के बीज को ढूँढना  होगा .

                                          
      सदा से युवा पीडी समाज सुधर करती आई है आज भी करना होगा .समाज मे फेली हर बुराई को दूर करने का बीड़ा उठाना होगा .अब चाहे वे बुराइयाँ देहिक हों ,देविक हों ,सामाजिक हों ,मानसिक हों ,भौतिक हों  या फिर राजकीय हों .    आज काल के युवकों को हम शिक्षा तो दे रहे हैं  पर दिशा नहीं .आज युवकों को सही दिशा का ज्ञान ,अपने कर्तव्यों का ज्ञान ,अपनी सांस्कृतिक धरोहर और भावी पीडी के उत्तरदायित्व को उठाने का ज्ञान सुचारू रूप से होना बहुत आवश्यक है.जब महाभारत के कुरुक्षेत्र मे अर्जुन कर्त्तव्य  विमुख हुआ तो कृष्ण ने उसेसामयिक  कर्त्तव्य पालन का उपदेश दे कर गीता जेसे ग्रन्थ की रचना कर डाली और कर्त्तव्य का महत्व समझाया  समय की यही मांग थी की अर्जुन सारे रिश्ते नाते और स्वार्थ को भूल कर एक धरम्पूर्ण राज्य की स्थापना करे ,फिर उसके लिए महाभारत जेसा युद्ध ही क्यों न करना पड़े .


             श्री रामकृष्ण ने भी विवेकानंद से यही कहा था की निर्विकल्प समाधी की साधना कर स्वार्थी न बनो ,देश की पुकार सुनो ,लोगों को वेदांत का ज्ञान दो तो तुम्हारी मुक्ति निश्चित है .और हम सभी जानते  है की किस तरह स्वामी विवेकानंद ने हिन्दू धर्म का और युवा शक्ति का परिचय पूरी दुनिया को दिया .तुलसीदास जी ने हाथ मे माला ले कर जप नहीं किया अपितु रामचरित मानस जेसे ग्रन्थ की रचना कर सारे देश का सही मार्गदर्शन किया .इस ग्रंथ्मै यह स्पष्ट है की भौतिक   प्रगति के साथ साथ अध्यात्मिक प्रगति भी अति आवशयक है नहीं तो देश का विकास तो रुकता  ही है साथ ही साथ मनुष्य का मानसिक पतन भी होने लगता है .हर माता पिता से आग्रह है की वे अपनी संतान को उचित संस्कार दें और उन्हें वीर धीर और कर्त्तव्य निष्ठ  बनाये हमारी युआ पीडी ही हमारे देश का आधार स्तम्भ  है..  इतिश्री..  

                                                                                      नीरा  भसीन

मेरी माँ...


मेरी माँ..


 
मुझे न बांधो तुम आँचल में 
                            मै पंख फैलाना चाहूँ गगन में..
        मुझे न बाँधो तुम पलकों में          
                                          मैं विश्व संजोना चाहूँ नैनो मैं..
                              मुझे न थामो तुम हाथों मैं
                                         मैं तारों को भरना चाहूँ मुट्ठी में..
                             मेरे कदमों को न रोको मेरी माँ
                                         मै लिख दूंगी अपना नाम गगन में..
                                      जहाँ से सूर्य उदय होता है...

 
                                                                                                                                   नीरा भसीन.

                                                                                                                                                                                        

सोमवार, 11 जुलाई 2011

वह नारी ही तो है

    वह नारी ही तो है
  


उषा किरण सी कोमल ,वर्षा की बूँदों सी पावन
फूलों की पंखुड़ियों समान पलकों का अवगुंथन उठा
नव जात शिशु ने जिससे पहले पहल निहारा
वह नारी ही तो है _ _ _ _ _ _ _ _ __












कोमल होंठों पर छाई पहली मुस्कान की बलैइयाँ लेती
नन्हे नन्हे हाथों में अपने स्पर्श से जादू भरती
मानव रूप को सर्व प्रथम अपने आँचल की छाँव देती
वह नारी ही तो है _ _ _ _ _ _ _ 



 








जिसने प्रभु वा परिजनो से परिचय कराया
जिसने संस्कारों का सस्नेह पाठ पढ़ाया
जिसने मात्रभूमि के लिए कर्तव्यों का भान कराया
वह नारी ही तो है _ _ _ _ 












ममता वरसाती स्नेह लुटाती, पल पल जीने की राह दिखाती
पथ दर्शाती,आदर्श बताती,धरती परसज्जन और वीर बनाती
वह नारी ही तो है _ _ _ _ _ _ _















           निर्माण की प्रेरणा ,ज्ञान की अविरल बहती  धारा
           देश को विवेक और आनंद जिसने समर्पित किया,
          वह नारी ही तो है ......
                                                                                                     नीरा भसीन