गुरुवार, 22 सितंबर 2011

नो की गाड़ी... संस्मरण

    नो  की  गाड़ी 



                                      
                          जीवन मै एक्शन रिप्ले हो जाता है जब कभी बरसों पहले बीते पलों को फिर से जी लेते है .पचास --पचपन दशक तो बीत गए होंगे उन दिनों  मै अपने माता पिता के साथ मध्य  प्रदेश के एक छोटे से गाँवt मै रहती थी .३ से ४ हजार की आबादी वाले उस गाँव की प्रतिष्ठा बहुत थी जिसके दो मुख्या कारण थे ---पहला यहाँ पर अनाज का बहुत पड़े पैमाने पर अनाज का क्रय विक्रय होता था और दूसरा यहाँ पर रेलवे स्टेशन था .गाँव के सारे कम काज घरेलु हों या वयपारी सब इन रेलगाड़ियों के आने जाने पर टिके थे .समय यानि गाड़ी आ गई है या अभी नहीं .                                      "अभी तक पेपर नहीं आया लगता है नो  की गाड़ी लेट लगती है .'  " माँ जल्दी जल्दी काम करती लल्लू को डांट रही है "अरे जल्दी से तयार हो कर स्कूल जाओ नो की गाड़ी कब की निकल गई .पिटोगे आज मास्टरजी से ."  "का हुआ मातें आज पानी लाये मै बड़ी देर हो गई .-----देर कां हुई बाई जी  अबैं तो नो की गाड़ी कड़ी ."---"पंडित जी कल की सत्य नारायण की पूजा टेम पर सुरु हो जानी चाहिए सब को बोल के रखा है गाड़ी निकलते ही आ जाएँ ."------"डाक्टर  साहब पेट मै बहुत दरद है कल दिन भर कुछो नईखाए .बस गाड़ी कड़ी तब पूरी भाजी खाए थे ."----डाक्टर ने सुई लगा दी ओउर कहा अभी तो दर्द की सुई लगा दी है जब रात को गाड़ी कड़े तो ये एक गोली खा लेना और सुबह गाड़ी कड़ने पे दूसरी ....."
                                              छोटे गाँव के अपने मजे होते है .गाड़ी स्टेसन पे कड़ी है और चौबे जी का लठेत दृवार को कहता है "भैया ठाकुर जी के घर से बाई जी आ राइ है ताना गाड़ी रोके रखियो ."क्या मजाल की गाड़ी चल पड़े  बाई जी हठ भर का लम्बा घुंगट निकले आराम से चल कर आती है फिर उनका सामान अन्दर रखा जाता है फिर अन्दर बेद्थी सवारियों को हटा कर जगह बनाई जाती है "ताना सरक जाओ भइया जानना सवारी है "अगर जरा सी भी किसी ने न नुकर की "कई न की चोबे जी के घर की बाई जी है"
                                                        

                   झाँसी स्टशन पर गेट से अन्दर घुसते ही बाएँ और एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ है ,जिसके नीचे पटरी के अंतिम छोर से सटी ये मानिकपुर पसेंजेर गाड़ी कड़ी होती है आना हो या जाना .हम दिल्ली से लोट कर इंतजार मै बेठे होते कब गाड़ी वहां आये और हम बेठे .गाड़ी छुटने के निर्धारित समय से दो घंटे ये गाड़ी प्लेटफार्म पर आ जाती और हम उसमे जा बैठते,सवाल था देर हो जाने पर कहीं सीट न घिर जाये इधर गाड़ी मै भीड़ इकठी होनी शुरू होती उधर बरगद के पेड़ पर चिड़ियाँ .सारा प्लेटफार्म चिड़ियों के चें चें से गूंजने लगता .धीरे धीरे भीड़ इतनी बाद जाती की लोग दरवजे और खिड़की का भेद भूल जाते .(उन दिनों खिड़की पर लोहे के सरिये नहीं होते थे )एक के बाद एक पोटलियाँ और बच्चे खिड़की के रास्ते से अन्दर फेंके जाते .अगर किसी आस पास के गाँव मै हाट या मेला लगा होता ,तब तो हाथ भर का लम्बा घूँघट डाले महिलाओं को भी खिड़की के रास्ते अन्दर डाल दिया जाता इतना ही नहीं पीछे आवाजें भी आतीं अरे जल्दी से सीट घेर लो नई तो बेठे की जगह न मिलेगी .गाड़ी चलते न चलते तिल भर जगह भी न बची होती .झाँसी से जब गाड़ी चलती तो गर्मी और धक्का मुक्की से बचने के लिए बाहर खड़े लोगों की भीड़ एक दम डिब्बे मै भर जाती उस समय ऐसा लगता मनो भूचाल आ गया है ."अरे हमाई सीट पे तुम केसे बेथ गए भैया "  खाली हती तो बेठ गए"--"खाली केसे हती हम अपना गमछा रख के गए थे अपनी सीट पे "अब जो एक बार बेठ गया वो बेठ गया गमछे की ऐसी की तेसी .सीट को ले कर बड़ी देर कहा सुनी होती .बीच बचाव किया जाता थोड़ी देर मै सब शांत हो जाता .टाइम पास के लिए मूंगफली खाई जाती .इतनी भीड़ मै भी मूंगफली बेचने वाले बड़ी सफाई से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाते.ये जो जरा देर पहले सीटों के लिए इतना झगड़ रहे थे की कहो अभी एक दूसरे का सर फोड़ देंगे पे अब आड़ेतिरछे हो कर हर आने आजने वालों को रास्ता भी दे रहे और बोल बतिया भी रहे थे .गाड़ी मै पहले से ही मूंगफली के छिलकों की तह अब कुछ और मोती हो जाती .इस गाड़ी की एक खास बात यह थी की इसमें बिजली पानी नाम की कोई सुविधा नहीं थी और सफाई से सख्त दूरी बनी रहती थी .
                                बरुसागर स्टशन पर अदरक बहुत अच्छीऔर सस्ती मिलती थी .गाड़ी रुकते ही माँ अदरक खरीदने लगती ओउर मेरे पिता जी बरुआसागर  की पुरी भाजी लेने चले जाते यहाँ की .पुरी भाजी खाए  बिना तो हमारी यात्रा अधूरी ही रहती थी.समोसे और पुरी भाजी का स्वाद तो आज भी यद् आने मुंह मै पानी आ जाता है .माँ और पिता जी के वापिस आने तक मै सीमा पर तेनात की तरह सीटों की रक्षा करती ''वहीँ की भाषा मै हर आने वाले को कहती की ''भैया एते नई उते बेठो जे सीट तो घिरी है ''पर माना करने पर भी कुछ हिस्सा तो सीट का घिर ही जाता था. गाड़ी जंयों जय्नो अगले स्टशन  पर रूकती जाती भीड़ भी कम होती जाती .
                                              एक बार एसा भी हुआ --मौरानीपुर आते आते डिब्बा काफी खाली हो चूका था .उन दिनों डिब्बे के बीचों बीच एक लम्ब्बी सीट होती थी यानि कुल चार लम्बी सीटे होती थी .मौरानीपुर का स्टशन छोड़ने का सिग्नल हो गया था की भड भड़ती हुई ४ --५ महिलाएं १०--१२ बच्चों के साथ डिब्बे मै आ घुसीं .ताबड़ तोड़ सामान डिब्बे मै फेंका जाने लगा .बिस्तर और बक्सों की धक्का पेल मै बर्तनों की खड़ खड़ भी सुनी जा सकती थी .सबके अंदर पहुँचते न पहुँचते गाड़ी चल पड़ी .पीछे से सुना ''रज्जू की माँ पहुँचते ही ख़त लिख देना और छन्नू  को हाकिम को दिखाना न  भूलना .और अम्मी को tel  दे  देना ............''
गाड़ी dur निकल  aai थी .हम सब गाड़ी के डिब्बे मै एक taraf simat  गए और दूसरी taraf  बच्चों की  धामा  चोकड़ी  के बीच स्टोव जलने  की अवाजें  सुनी दी .और जरा सी देर मै पूरा  डिब्बा मसालों  और मांस   के भुने  जाने की गंध  से भर गया .खाना  बनता  रहा  बच्चे सो गए  और हम अपना गाँव आने पर अँधेरे मै संभल संभल कर उतर गए . ४५ साल बाद रत के दो बजे मै झाँसी स्टेशन पर खड़ी थी मुझे पहले से आगाह कर दिया गया था उस दिन उत्तर प्रदेश और मद्द्य प्रदेश मै चुनाव होने के कारण राजन्यो की सीमा पर आवागमन रद्द कर दिया गया था.अब ऐसी हालत मै मेरे पास एक ही विकल्प था'' नो की गाड़ी '' ये गाड़ी झाँसी से सुबह ७ बजे  के आस पास निकलती थी .बची खुची रत मैंने विश्राम घर मै काटी.और सुबह ६ बजे मै मानिकपुर पस्सेंगेर पकड़ने निकल पड़ी
                       

           सोच रही थी अभी गाड़ी निकलने मै एक घंटा है  बताने की जगह तो मिल सकती है.पर राज्य्नो की सीमा पर प्रतिबंद के कारण जितनी भीड़ गाड़ी के बहार थी उतनी ही अन्दर भी ठसा ठस भरी थी .मने गाड़ी की लम्बाई दो बार नपी लग रहा था किसी बिछड़ी सखी से मिल रही हूँ.फिर धीरे से हिम्मत जूता कर एक डिब्बे मै घुस गई .सामान साथ मै न के बराबर था एस लिए हिम्मत बंधी हुई थी .पुरे डिब्बे मै नजर घुमाई सीटें तो कई खली थी पे उन सब पर रुमाल,अख़बार और गमछों का आधिपत्य फेला हुआ था .मै भुत असमंजस मै खड़ी थी की सुने पड़ा ''माता जी आप तो इतनी बेथ जाओ जे अख़बार हमें दे दो '' मेने प्रश्न भरी निगाह से उसकी तरफ देखा ----''अरे आप तो बेथ जाओ इत्मिनान से और जड़ी कोऊ आइये तो हम निपट लें  अरे भी तब की तब से देखें  का नै तो ---आप तो बेठ जयो  .और गाड़ी चलने से पहले ही वो सीट मुझे सादर समर्पित कर दी गई.हमारी सभ्यता गांव मै आज भी जीवित थी .एक दो ने बड़े दार्शनिक अंदाज मै कहा ''अरे भी कछु देर की इ तो बात है बेठो बाई जी तुम तो इत्मिनान से बेठो.मै मुस्कुराये बिना न राह सकी .गाड़ी मै आज भी पानी बिजली नहीं थी पर मूंगफली केछिलके आज भी पेरों के नीचे बरकरार थे .वेसे ही बेतार्तेब रखे सामान पर बेतरतीब ढंग से लोग बेठे थे .पर लोगों मै आज  भी एक दूसरे के लिए वेसी ही हमदर्दी थी. हाँ कुछ बदला था तो उनका पहनावा .धोती कुरते की जगह रंग बिरंगी जींस और शर्ट ने ले ली थी हाथों मै cellphone  आँखों पर लेबल लगा चश्मा,और मुं मै गुटका  .महिलाओं ने चमकीली चमकदार साड़ियाँ पहन रखी थी.घूँघट तो लगभग नदारद था .
गाड़ी चली बरुसागर भी आया .वो पुरी भाजी समोसे  की दुकान आज भी वहीँ थी मुहं मै पानी आ रहा था पर मै अपनी जगह से उठी नहीं ---सीट घिर जाने का डर था पर आज स्टेशन  दर स्टेशन भीड़ बदती जा रही थी -----देश की बदती आबादी का एक छोटा सा नमूना .-------नदी नाले पहाड़ गाँव बस्तियां  सब वेसे ही थे मन और आंखे भर आई.और नौ बजे मै अपने गाँव उतर कर बस पकड़ने आगे बढ गई.
                                                                 नीरा भसीन

जननी तुम कहाँ हो ??

जननी तुम कहाँ हो








                         माँ बाप धन्य हुए जब बेटी की शादी
                 एक आई -टी इंजिनीयर के साथ  हुई

                 लाडों में पली ,नाजों मे ढली
                 घर की रोनक आज पराई हुई

   माँ ने दान दहेज़ दे कर बेटी को ससुराल बिदा किया था ,

                  सास ने आशीर्वादों के साथ अपना बेटा दे कर

                   घर की लक्ष्मी को परदेस विदा कर दिया
              नया घर ,नयी  जिंदगी ,ओउर हुआ एक नया सवेरा ,

                  

                 "उठो जल्दी करो ,नाश्ता दो काम पर जाना है "
                  कल तक जब भी सबेरा हुआ तो माँ ने कहा था
                   चल बिटिया जल्दी से नाश्ता कर ले
                    नहीं तो ठंडा हो जायेगा .........


                                                                         जननी तुम कहाँ हो

                     अभी कल की ही तो बात है
       अलमारी मे ठूंस ठूंस कर भरे कपडे देख कहा करती थी
                   "माँ क्या पहनू कुछ भी ढंग का नहीं है "
                    आज डिब्बों मे मिर्च मसाले ढूंड रही हूँ 


                                        


   जननी तुम कहाँ हो

                    वो दिन कितने सुहाने थे
                    जब जी चाह तब सो कर उठते थे ,
                    मन ने जो चाह जिद कर के पा लेते थे
                    पर वो सब कल की बातें है

                    अब बिखरे पेपर ,चाय के खाली  कप
                   बेतरतीब पड़े स्लीपर और भीगा तोलिया
               घर मे बिखरे पड़े हैं -----ये क्या मुसीबत है?


                                                       जननी तुम कहाँ हो --------?

                    आज मेरे अ न्दर भी एक जीवन पल रहा है
                    मुझे याद आती है तुम्हारी वो मुस्कराहट
                     जो सदा मुझे कुछ सिखा जाती थी
                    याद आता है तेरा  वो स्पर्श जो सदा
                     मेरा हौसला बड़ा जाता था
                                                  

                               कल मै भी जननी कहलाऊंगी
                               पर मेरी जननी तुम कहाँ हो 


                     
                          जीवन ऐसे ही आगे बढता है .
                          पर परिवार तो बिखर ही रहे हैं
                          फिर भी जननी तुम धन्य हो..
                           सभी रिश्तों से भिन्न हो..
      बिखरते   परिवारों को जोड़ने का तुम्हारा  काम जारी है.. 
                    हाँ जननी इसी का नाम तो नारी है..
                                                                                                            
                                                                           नीरा भसीन