मंगलवार, 26 नवंबर 2013

























एक बार फिर स्वागत है ज़िंदगी के उस मोड़ पर.. जहाँ थमना चाहता है मन.. झुझते हुए जीवन की थकान मिटाने के लिए.. रुकना चाहते हैं कदम कुछ देर सुसताने के लिए.. स्पर्श पाना चाहते हैं हम अपनो का.. स्वयं में विश्वास जगाने के लिए.. किंतु.. मानव मन है.. दिन रात उमंगे भरता रहता है.. भूल जाता है अपने जीवन के कर्तव्य को.. विसर पड़ती है जीवन  चक्की की.. और फिर ज़रूरत पड़ती है अपनी जीवन आवश्यकताओं की.. किंतु..परंतु छोड़ कर फिर ज़िंदगी चल पड़ती है.. सुखी रेत पर.. तपते कदमों के साथ.. एक नये मोड़ की तलाश में.. हाँ मित्रो.. जिंदगी फिर चल पड़ी.. स्वागत है.. जिंदगी के संघर्ष में..
                                                                                                          नीरा

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