शनिवार, 28 जनवरी 2012
शुक्रवार, 27 जनवरी 2012
' बसंती चोला '
रंग तरह तरह के रंग --सभी लुभावने लगते हैं .प्रतेक रंग प्रतीकात्मक है .जेसे सफ़ेद रंग शांति का प्रतीक है तो हरा रंग समृधि का वह्नी लाल रंग उग्रता को प्रगट करता है . अलग अलग रंग देव गणों ने धारण कर अपनेभक्तों को भी उन रंगों मै रंग लिया है .ये सभी रंग प्रकृति ने दिए है .जब शीत ऋतू का आगमन होता है तो प्रकृति भी अपने दामन मै सहेज कर रखी कलिंयों को पत्तों के अवगुंठन से बाहर करती है और धीरे धीरे पेड़ पोधों के साथ साथ धरती परऔर खेत खलिहानों मैभी कलिंया अपना रूप ले लेती है . चारों ओर बसंत ही बसंत लहरा उठता है.यह देख कर किसान फूले नहीं समाते .नित नए मस्ती भरे ढंग से लहलहाते खेतों को देख आँखों मै बसे सपने मानो साकार होते दिखने लगते है .प्रकृति पर छाए बसंत उत्सव की छटा चारों और देखते ही बनती है. प्रकृति ने प्रोतसाहित किया तो पूजा मै बसंती फुल चुन कर समर्पित किये ,बसंती वस्त्र पहन कर हवन और यज्ञ सम्पन्न किये --यज्ञ की पवित्र अग्नि मै पीले वस्रों का होम किया गया--पीले चावल पका कर नेवैद्य दिया गया .यह सब कुछ समर्पण की भावना का प्रतीक ही तो है. इतना ही नहीं धरती माँ ने भी अपार धन धान्य की सम्पदा और औशधिय्नो की अनूठी देन प्रत्येक जीव धारी को समर्पित कर आरोग्य अवंम संरख्षण के साथ साथ जीवन के भरण पोषण का भी प्रबंध कर दिया .
भारत देश एक मात्र ऐसा देश है जहाँ बसंती रंग ने त्याग के क्षेत्र मै अनोखा इतिहास ही रच डाला है . मातरु भूमि के लिए अपने प्राणों को नियोछावर करने का जब जब समय आया तब तब रन बांकुरों ने बसंती बाना धारण कर पुरे विश्व के समक्ष अपनी छाप छोड़ी है--हंस हंस कर वीरों ने अपने प्राणों की बलि चड़ा दी है . राजपूतों की कहानियां तो सबसे अग्रणीय मानी जाती है .युद्ध मै शत्रु के हाथों पराजय स्वीकार इन्हें कभी भी सवीकार न था . जब कभी ऐसी परिस्थितियना आती और युध से लौट कर आना संभव न दिखता तो ये राजपूत कूच करने से पहले बसंती वस्त्र धारण कर लेते थे जिसका अर्थ था आज देश के लिए प्राणों को न्योछावर करने का समय आ गया है . वीरों को अश्रु पूरण विदाई देने के बाद राजपूत स्त्रियाँ शत्रुओं से अपनी आन बान की रक्षा के लिए आत्मदाह कर लेती थी .
बात अधिक पुरानी नहीं है जब अपने घर के आंगन मै बेठी एक सौभाग्य शाली माँ अपने पति की पगड़ी रंग रही थी तब उसके नन्हे बालक ने पास आ कर कहा "माँ मेरा चोला भी बंसंती रंग दे "माँ ने मुस्काते हुए कहा था"हाँ रंग दूंगी "वे जानती थी की जंजीरों से जकड़ी भारत माता को स्वतंत्र करना ही उनके पुत्र का एक मात्र लक्ष्य था .जब जब भगत सिंह जेल गए तब तब जेल का प्रांगन उनके प्रिय गीत "माये रंग दे बसंती चोला "की धुन से गूंज उठता था .वीरों को कर्त्तव्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने वाला ये गीत आज भी जब कभी सुनाई पड़ता है तो रोम रोम सिहर उठता है .ऐसी बसंत ऋतू को शत शत प्रणाम जिसने मानव जाति को त्याग व कर्त्तव्य की राह दिखाई .
यदि धर्म की दृष्टि से देखें तो गायत्री मंत्र को सिद्ध एवं सशक्त मंत्र माना जाता है .गायत्री माँ की प्रतिमा को सदा बसंती वस्त्रों से विभूषित किया जाता है ---यहाँ तक की गायत्री माँ के भक्त बसंती बाना धारण कर अपने जीवन को जान कल्याण हेतु समर्पित कर देते है .कहते है जो काम तलवार नहीं कर सकती वो लेखनी कर देती है पर बसंत ये तो प्रकृति की अदभुत छठा है ---न तलवारों से टपकता लहू ,न लेखनी से निकले लेख --बस धरती की अनूठी छवि और जीव मात्र को अभय देने वाला बसंत ' तन मन मै समर्पण ,भक्ति और त्याग की भावना को जगा देता है .इश्वर से प्रार्थना है जब कभी हमारे जीवन मै बसंती चोला पहनने का अवसर आये तो हमारे हाथ न कांपे हमारे प्रयत्नों से जन जन का कल्याण हो और भाई चारे की भावना को सदा बल मिले .
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