शुक्रवार, 25 मई 2012

" बिटिया ने कहा "

"  बिटिया ने कहा "

प्यारी माँ मैं नमन करूँ यां कोसूं अपने भाग्य को 
बेटी बनकर आई , फिर भूली बेटी के सम्मान को 

                 तुम स्वयं धरा पर बेटी बन के आईं  
                 फिर मेरे जनम पर आंसू  बहाती  हो क्यों  ?
                  
                  तुमने अपनी माँ  के' आंचल' मे खूब आंख -मिचोली खेली होगी
                फिर मुझसे अपना' आंचल' छुड़ाती हो  क्यों..            

                 तुम्हारी माँ ने तुम्हे सीने से लगा' बालाएं' तो उतारी होंगी
                   फिर मेरे जन्म लेने पर मुझे' बला' समझती हो  क्यों..

                एक जननी ही दूसरी जननी को जनम दे कर 
               परमपिता परमेश्वर की रीति का निर्वाह करती है 

              तो फिर मेरे आस्तित्व का' दिया' बुझाने ,
             तुम प्रभु के द्वार' दिया' जलाती हो  क्यों..
 
               माँ मैं  तेरा अंश  ही नहीं, जीवित सा स्वरुप भी हूँ 
             अपनी होकर भी ,  फिर तुम मुझसे पिंड छुड़ाती हो क्यों..


शुक्रवार, 18 मई 2012

विभाजन





जुलाई  १९४७ की बात है...
भारत का  विभाजन लग भग  निश्चित था .देश भर में  जाति वाद के नाम पर हाहाकार   मचा हुआ था ,कुछ मुठी भर लोग अपने घर बार छोड़ कर पंजाब दिल्ली आदि क्षेत्रों में  आ कर बस गए पर बाकी सब लोग यह मानने को यह तैयार  ही नहीं थे की उन्हें उनके अपने  घरों जमीनों और व्यापार को छोडना पड़ सकता है .ऐसे  लोगों ने अंत तक अपनी जनम भूमि पर रहने की ठान ली थी पर धीरे धीरे हालात बहुत ही बिगड़ रहे थे .आगजनी और मारकाट की घटनाएँ जगह जगह हो रही थीं जिसके कारण वश पुलिस का पहरा बढता जा रहा था और जगह जगह पुलिस कर्फ्यू  लगा रही थी .लोग अपने घरों में  दुबके रहते थे फिर भी  भय हमेशा बना रहता था .सबसे पहले अपनी जान की चिंता फिर भविष्य की चिंता --भाग कर कहाँ जायेगे .जन्म भूमि का मोह कितना भी बड़ा क्यों  न हो  यदि जीवन ही न  बचा तो क्या कर पायंगे,  खाली हाथ -- जीवन सुरक्षा भी भारी पड़ रही थी .   अब वे बहुत कम लोग बचे है जिन्हों ने विभाजन का विभीत्स रूप  देखा है .पर आज भी जब उन्हें वो  पल याद आते है तो उनकी आँखों  मै दहशत छा जाती है .ऐसी ही आँखों देखी कुछ बातें मुझे कृष्णाजी और उनके पति लालचंद जी ने बताई .निम्न कहानी  को मात्र आँखों देखी नहीं कह सकते ये आप बीती घटना है .-----
                    


      श्रीमती  कृष्णा जी और लालचंद जी लाहोर में बेंड- रथ रोड पर रामगली में  रहते थे1 विभाजन के दस पंद्रह दिन पहले की है 1 चारों   तरफ मारकाट हो रही थी .कहना मुश्किल था की कौन किसको मार रहा था .ऐसे मै कृष्णा जी ने अपनी ससुराल डिंगी जाने का निश्चिय किया .ये जरुरी था की पूरा परिवार साथ मे रहे .लालचंद जी लाहोर मे मेडिकल कालेज मे एक कलर्क हेसियत से काम   करते थे और उनका वहां जाना कठिन था .फिर भी वे कृष्णा जी को डिंगी छोड़ने चले गए .जिस गाड़ी से ये लोग जा रहे थे उसमे अधिकतर मुस्लमान लोग ही थे .सारा रास्ता देश के बटवारे को ले कर गाली गलोच चलता रहा .कभी कभी तो उन्हें लगा की अभी तलवारें चलने लगेंगी .किसी तरह इश्वर का नाम ले कर ख़ामोशी से सफर पूरा किया और जेसे तेसे घर पहुंचे .डर के मारे  उनके प्राण कंठ मे अटक गए थे पर इन हालातों मे भी लालचंद जी को अपनी नौकरी पर जा कर हाजरी देनी थी.यह सम्भावना भी थी की उनका स्थानानतरण  शायद नए भारत मे कहीं हो जाये इस लिए कार्यालय पहुंचना जरूरी था  .वे रात के समय डिंगी शहर  से अपना वेश बदल कर निकले .उन्हों ने लुंगी पहन ली सर पर बहुत सा तेल लगा सर के बीचों बीच मांग निकाल ली .किसी तरह बचते बचाते वे लाहोर पहुँच गए .यहाँ आ कर वे अपनी ससुराल मे रहने लगे .उनके ससुर जी भी मेडिकल कालेज मे हेड कलर्क थे शायद १२ या १३ अगस्त   (स्वतंत्रता से दो तीन दिन पहले )की बात है डर की वजह से लालचंद जी ने अपने ससुराल वालों के साथ घर छोड़ दिया और यूनिवर्सिटी हाल के पीछे सरकारी सिविल डिस्पेंसरी के इंचार्ज डॉक्टर सबरवाल के पास रहने चले गए. वहां डिस्पेंसरी के नल पर हाथ मुंह धोने या नहाने के लिए कुछ मिलटरी वाले आते रहते थे और आपस में बात करते थे "मैंने आज २० आदमियों को मारा दूसरा कहता मैंने २५ को मारा " मानो मानव हत्या  न हुई कोई तमाशा हो गया .इनकी बहादुरी के किस्से सुन सुन कर लालचंद जी ने एक मिलटरी वाले से उनकी बहादुरी के किस्से सुनाने का अनुरोध किया..

       ---मिलटरी वालों ने बताया   की हिन्दू और मुस्लमान दोनों ही मिलटरी वाले मिल  कर गश्त  पे  जाते है  अगर मुस्लमान सिपाही को कोई हिन्दू या सिख दिख जाता है तो वो उसे गोली मार देता है और यदि हिन्दू सिपाही को कोई मुस्लमान दिख गया तो वो उसे गोली मार देता है .बस इसी तरह हम अपनी ड्यूटी पूरी करते है ,शाम को यहीं इकठे हो कर विश्राम करते है .उधर मारकाट के बाद लाशें उठा कर मेडिकल कालेज के मुर्दा घर मे रख दी जाती थीं .. यहाँ भी यदि कोई  हिन्दू सेवा समिति वाली  टोली आ जाती तो उसे सामने से उठा कर १० लाशें दे दी जातीं.बिना पहचान किये की वो हिन्दुओं की लाशे थी या फिर मुसलमानों की वे लाशें ले जाते और उनका दह संस्कार कर देते . .इसी तरह जब मुसलमानों की कोई समिति या फिर खाकसार पार्टी के लोग आते तो उन्हें भी सामने से १० लाशें उठा कर दे दी जाती और वे जा कर  दफना देते .शायद लाशों की कोई जाति नहीं होती .
                
    
     १५ अगस्त को लालचंद जी ने अपनी ससुराल वालों के साथ मिल कर लाहोर छोड़ने का निश्चय कर लिया .१५ अगस्त को जब ये सब लोग लाहोर स्टेशन पर बेठे तो पूरा स्टेशन और आस पास के सारे इलाके को खाक सार पार्टी  के हथियारबंद लोगों ने घेर रखा था ------कारण की  जेसे ही पाकिस्तान बनने की  घोषणा होगी  वेसे ही स्टेशन पर बेठी   हिंदुयों  की  भीड़ की  कतल  कर दी जाएगी.शाम को जब पाकिस्तान बनने की घोषणा हुई तो चारों तरफ भाग दौड़ मच गई .समाचार  ये मिला था की लाहोर शहर पाकिस्तान मे आ गया है पर लाहोर छावनी स्टेशन भारत की सीमा मे चला गया है .पलक झपकते ही खाकसार पार्टी के लोग वहां से भाग गए और स्टेशन पर खड़े हिंदुयों की जान बच गई .रात १२ बजे भटिंडा जाने वाली गाड़ी आई और लालचंद जी अपने परिवार के साथ उसमे सवार हो गए -----पर आगे जाना कहाँ है  वो किसी को  पता न था  .सुबह होने से पहले वे भारत की सीमा मे प्रवेश कर चुके थे .जेतो मण्डी कोई दूर के रिश्ते दर रहते सब लोग यहीं उतर गए और ३--४ दिन बाद फिरोजपुर जालंधर होते हुए अमृतसर आ गए और यहीं पर लालचंद जी पोस्टिंग मेडिकल मे हो गई.कुछ समय बाद कृष्णा जी भी अपने बचे खुचे परिवर के साथ अमृतसर  पहुँच गई.परिवार के चार लोग विभाजन की भेंट चढ़ चुके थे.अमृतसर मे पुतलीघर इलाके मे  १२ नंबर माकन मे आ कर रहने लगे .यहाँ रहने वाले मुस्लमान अपने घर बार छोड़ कर पाकिस्तान जा चुके थे  ---और अब ये मोहल्ला पूरी तरह सुनसान था  जहाँ पाकिस्तान से आये हिन्दू अपने सर छुपाने की जगह ढूंड रहे थे इसी मकान मे लालचंद जी को हीर राँझा की एक पुरानी पुस्तक मिली
      पहली पंक्ति जो उनहोंने पड़ी वो कुछ इस तरह थी ..                                  

                                  की होया जे भज गया ठुठा
                                  सातों कीमत ले लवे मठ दी ...
सभी अपने अपने मठ दे कर विभाजन की कीमत ही चूका   रहे थे .इतना नर संहार  पर दोषी कौन..??

                                                                                                                                                          

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

चिंगारी

                                                   चिंगारी 



     



  विज्ञानं  ने यह तो सिद्ध कर दिया है की अनुमानतः कब और कैसे यह धरती बनी तत्पश्चात कब और कैसे इस धरती पर जीवन पनपा .पानी मे जीवन की पहली साँस से  ले कर  धरती पर फैले अनगिनत जीवधारिन्यो के जन्म के  बीच लाखों करोड़ों वर्ष लाग गए होंगे .ऐसे अनुमान भी गणित, ज्ञान  विज्ञानं और तकनिकी सहायता से सिद्ध किये जा चुके है और जिनको हम सही भी मानते है .पनपती परिस्थितिन्यो के बीच समय का अनुमान कल्पना शक्ति की पराकाष्ठ ही है .पर जो सत्य है वो सत्य ही है .इस धरती पर जीवन का एक ही रूप रहा होगा पेट भरने के लिए खाद्य सामग्री  की खोज और प्रजनन .और ये परिस्तिथियाँ लाखों वर्षों तक ऐसे ही चलती रही होंगी ठीक उसी तरह जेसे वर्षा शीत और ग्रीष्म ऋतू की प्रक्रिया चलती जा रही थी वेसे ही अनेकों अनेक जीव जन्म लेते होंगे व मृत्यु को प्राप्त होते रहे  होंगे क्योंकि प्रकृति अपनी गति मे परिवर्तन इतनी शीघ्रता से परिवर्तन नहीं लाती. यदि कल्पना करें तो लगता है की सभी जीव इस धरती पर सामान रूप से विचरते होंगे और शारीरिक बल अवंम वजन के अनुसार अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते होंगे .तभी कंही किसी प्रजाति के हाथों से पत्थरों के बीच खेलते या फिर किसी और कारण वश कोई चिंगारी फूटी होगी वो आग का रूप धारण कर लिया होगा .जिस किसी भी प्रजाति के हाथों यह घटना घटी वह चोंका देने वाली थी, क्योंकि  यहीं से सोचने की प्रक्रिया का आरंभ हुआ  '.अग्नी ' जिसने सभी जीव्धारिय्नो से मानव जाति को एक अलग ही दिशा प्रदान कर दी यह जो भी अविष्कार था वो आदि मानवों की निजी सम्पति बन गया . अब धीरे धीरे चिंगारी  का अर्थात अग्नि का सदुपयोग होने लगा .एक तरफ आदि मानव कर ही इससे लाभ उठाया जा सकता है .कंयोंकी जो भी वस्तु इसके पास जाती है वो नष्ट हो जाती है .मन मे सदा भय बना रहता था पर फिर भी इसने  मानव जाति को अन्य जीव जन्तुय्नो से पृथक कर दिया .अब इस जाति मे सोचने विचारने की प्रक्रिया बड़ी तेजी से प्रबल हो रही थी ..शायद यह्नी कहीं इसी काल मे आपने पराये का भेद उपजा होगा .और तभी आदि मानव ने आपने चमत्कार को सहेजने के लिए समूहों मे रहना शुरू कर दिया होगा .हम इस तथ्य को कोरी कल्पना कह कर झुठला नहीं सकते .बदलाव की प्रक्रिया मे पहली इकाई परिवार ही रहे होंगे .अग्नि के कारण अधिपत्य की भावना का जन्म हुआ था तो जनम देने की प्रक्रिया मे 'ममता 'जेसी भावनाए अवश्य छु गई होंगी .ओर यही हुआ  'मै'मेरी ' और हमारी 'जेसी भावनायों का सूत्रपात .  अब तक उस छोटी सी चिंगारी ने मानव जाति को अन्य प्रजतिन्यो से भिन्न बाना दिया था .भोतिक सुखों की संभवत यह पहली कड़ी थी .भोजन पका कर खाना यह अनुभव की दूसरी सीडी थी .उसके बड़ जंगली जानवरों से अपनी सुरक्षा और अँधेरी रातों मै उजाले की चमक यह विकास और गायन की एक और बड़ी सफलता थी .सब को सभी सुख सामान रूप से मिलें इसलिए लोगों ने अपना मुखिया चुन कर कबीलों और मै रहना शुरू कर दिया होगा .और  यहीं से कबीलों की छोटी छोटी इकाई के रूप मै 'परिवार ' को जन्म मिला .संभव है पारिवारिक वयवस्था को बनाये रखने के लिए किसी वयोवृद्ध सदस्य को मुखिया बाना दिया गया हो.इन सब बातों के कोई लिखित प्रमाण तो नहीं है पर फिर भी इतिहास के जो पृष्ठ उपलब्ध है वे पर्याप्त  है हमारी प्राचीन और अति प्राचीन सभ्यता को जानने के लिए .
      एक बात और सामने आती है वो यह की जब कभी कालांतर मै गाँव शहर या राज्य्नो का विस्तार हुआ तब परिवारों की वयवस्था का देश की वयवस्था मै बड़ा योग दान रहा होगा .एक जुट हो कर रहना ,मिल बाँट कर जीवन का निर्वाह करना ,विचरों मै व कर्म मै शुद्धता एवं अहिंसा का ताल मेल बनाये रखना यह सब परिवार की ही देन था .धरती के टुकड़े के लिए या पशु धन के लिए जब आपसी झगड़ों का जन्म हुआ तभी जहाँ एक ओर रक्तपात और लूटमार बड़ी वहीँ दूसरी ओर पारिवारिक संबंधो मै दृढ़ता भी बड़ी .   परिवार 'एक वो इकाई है जहाँ से अपनत्व का ममता का स्नेह का ,त्याग का ,सेवा का विश्वास का .आधारर का , आभार का,ज्ञान का ,समर्पण का ,दूसरों के लिए जीने का ,क्रोध का ,अनुशासन का, छोटों के लिए स्नेह व बड़ों के लिए माँ सम्मान आदि अनेकों अनेक भावनाओं का जन्म हुआ .एक एक परिवार में  ५०-६० से भी अधिक सदस्य हुआ करते थे और सामूहिक आय व्यय का लेखा जोखा घर के मुखिया के हाथ मै होता था .यह मानव समाज का एक मजबूत संगठन था .कर्म के अनुसार समाज को बाँट कर 'जाति 'प्रथा का चलन शुरू हुआ जिससे उंच नीच के भेद भाव निःसंदेह बदने लगे पर गाँव और नगरों के बड़ते आकर को सुवय्वस्था भी मिली .मानव जाति के विकास को लाखों वर्ष बीत गए परिवार , समाज,गाँव नगर और राजन्यो अवनम गणराज्न्यो का निर्माण बनता और बिगड़ता रहा .इन सब परिस्थितिन्यो के बीच जो स्थिरता थीतो  वो थी मनुष्य की निजी आवश्यकतायें जो सिमित होने पर भी जीवन निर्वाह के लिए अति आवश्यक वस्तुंए मात्र ही थी .पर फिर भी नव निर्माण का प्रवाह निरंतर प्रशस्त था .वो कभी रुका ही नहीं .एक बार जो मिल गया वह तो अपना हो ही गया पर इसके आगे और भी बहुत कुछ हो सकता है यह सोच कभी रुकी ही नहीं .खोज छोटी हो या बड़ी ,हर खोज को जीवन स्तर ऊँचा उठाने के लिए प्रयोग मै लाया जाता रहा .एक नई खोज  एक नई  परिभाषा ,एक नया सुख और एक नया विस्तार --परिवारों से निकल निकल कर लोग परिवार के लिए नए नए सुखों की खोज मै दूर दराज के देश प्रदेश मै फेलाने लगे और इस तरह परिवारों के संगठनो का विघटन होना शुरू हो गया .आदि काल मै भड़की चिंगारी अब एक विकराल रूप धारण कर चुकी थी .प्रगति की इस आंधी मै सब कुछ उलट पुलट हो रहा था .संयुक्त परिवार अब छोटी छोटी इकाइयों मै बंट रहे थे .सुखों को संजोने की होड़ ने देश प्रदेश के बीच की दूरियां मिटा दी --यहीं पर हुआ सभ्यता और संस्कृति का हनन स्थानांतरण से सभ्यता व आचार विचार मै परिवर्तन होने लगा .तीज त्याव्हारों को मनाना किसी भी स्थान की जल्वाऊ वहां की उपज और सदुयों से चली आ रही प्रथायों पर निर्भर करता है .इसी लिए परम्पराओं में परिवर्तन होने लगे . 









     इससे एक ओर तो विभिन्न कलायों का एक दूसरे मै समावेश हुआ और समाज मै समता को बल मिला  वहीँ दूसरी ओर  वर्षों से चली आ रहे  पारिवारिक रीती रिवाज लुप्त होने लगे .अज्ज हम यह नहीं कह सकते की अमुक वयवस्था कितनी प्राचीन है .   बस एक या दो सदी पहले की ही बात होगी जब कभी कोई परिवर्तन होते भी थे तो उसका आभास जीवन रहते पता नहीं चलता था .पर अब एक ही जीवन मै इतने परिवर्तन हो जाते है की इतिहास पर कभी कभी संदेह होने लगता है .यह प्रक्रिया बिना दस्तक दिए हमारे जीवन मै प्रवेश कर रही और हम आपने को धन्य मान रहे है .पर सच तो यह की जब हम आपने चारों तरफ निगाह डालते है तो आपने को बिलकुल अकेला पाते है .बचपन की ऊँगली थमने को हम तयार नहीं वह अवांछनीय है कह कर हमने  अपनी भावी पीडी को संस्कार और संस्कृति विहीन कर दिया .और आपने जनम दाता प्रगति की रह मै एक बोझ कह कर उसे नकार दिया .बिखरते परिवार और टूटते रिश्तों मै हमारी भावी पीढ़ी  स्नेह की शबनम से वंचित भोतिकता मै अपना संबल दुंद रही है .ऐसी परिस्थितियों को हम आपने नैतिक मूल्यों पर एक प्रहार मानते है . ज्ञान हो या विज्ञानं कोई भी खोज कोई भी भोतिक सुख हमारे नैतिक मूल्यों से ऊँचा नहीं होना चाहिए कोई भी सुख तब तक पूरा नहीं जब तक वो परिवार के बीच मिल बंट कर मनाया  नहीं गया .पर अब अपनों की परिधि शुन्य से शुन्यतर होती जा रही है और इस शुन्य की शुन्यता इतनी गहरी हो चुकी  है की हम अपनी मानसिक शक्तिओं की शक्ति को भुला बेठे है .हमारे पास मानसिक और व वयावहारिक उत्थान  की इतनी शक्ति है की हम फिर से एक जुट हो कर सयम व संस्कारों के स्तर को ऊँचा उठा कर अपनी प्राचीन परम्प्रयों का व संस्कृति का आवाहन कर सकते है .मान मै प्रश्न उठता है--- क्या एसा होगा क्या पारिवारिक मूल्यों को हम भोतिकता की चमक से ऊपर उठ के देख पाएंगे .--

             कनक कनक ते सो गुनी मादकता अधिकाए
                  या खाए बोराए जग व पाए बोराए .


बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

समता श्री मंगत राम जी की..

                              
                 

                    जब जब धरम की हानि होती है और अधरम की वृद्धि होती है तब तब ही मै आपने रूप को रचता हूँ  " श्री क्रष्ण भगवान ने ऐसा गीता में कहा है .और यह सच भी है की समाज की विषम परिस्थितिय्नो से प्रेरित हर युग और काल मे कहीं न कहीं  कोई संत पुरुष अवतरित हो पर ब्रहम परमेश्वर के सत्य स्वरुप की और धरम की राह दिखता है. निम्नलिखित लेख मे जिन संत पुरुष की जीवनी का उल्लेख है उनका जन्म२४ नवम्बर  वर्ष १९०३ मे रावलपिंडी  ( पाकिस्तान )जिले के गंगोठिया गाँव के एक ब्राह्मन परिवार मे  हुआ था .ये वो समय था जब भारत दासता की जंजीरों मे जकड़ा था और देश मे चारों तरफ अराजकता फैली हुई थी धर्म के नाम पर हिंसा जोर पकड़ रही थी ऐसे समय मे .संत मंगत राम जी ने समता की  भावनाओं का प्रचार किया . उनका कहना था की समतावाद भारत  की पुरातन अधय्त्मिकता और  परम्पराओं की पुष्टि करता हैऔर  जिसके आभाव मे अहम् भाव दुखों का मूलभूत कारण बन जाता है .अहंकार ही सबसे बड़ी जड़ता और मुर्खता है .
       समता अखंड शांति ,कुल विघन दोष से न्यार   'मंगत 'रूप नारायण का ,तत्त  समता विचार .
       मंगत राम जी मे बालकों जेसी चंचलता नहीं थी .४ वर्ष की आयु से ही आपने धयान लगाना शुरू कर दिया था .और सातवीं कक्षा मे पहुँचाने तक वे पूर्णतया धयान मे लीन रहने लगे .अभी उनकी अवस्था मात्र १३ वर्ष की ही थी की उन्हें दिव्य अनुभूतियाँ होने लगी .वे पदाई और घर संसार के वयवहार से दूर भागने लगे .गाँव के पास जंगल मे जा कर वे घंटों दत्तचित्त हो कर धयान करते  थे . एक बार वे पुरे ४० दिन तक ध्यानावस्था मे रहे और तब अचानक उन्हें आपने अंतर मन मे इतने उज्जवल प्रकाश का अनुभव हुआ मानो कोटि कोटि सूर्य अम्बर पर छा गए हों .ऐसे समय मे उनके अन्तर मन से एक महा  मंत्र का प्रादुर्भाव हुआ...
        ओं ब्रहम सत्यम ,निरंकार अजन्मा ,अद्वैत पुरुषा,सर्व व्यापक ,कल्याण मूरत पेर्मेश्वराए नमसतं .
    यही मंत्र आगे चल कर उनके भक्तों के लिए ब्रह्म सूत्र बन गया .इश्वर की अनुभूति होने पर उन्हें जीवन से विरक्ति होने लगी .पर अब भी वे पाठशाला जाते थे .एक दिन उनकी कक्षा मे एक अंग्रेज इंस्पेक्टर जाँच के लिए आये और अनेक प्रश्नों के बीच विद्यार्थिय्नो से यह पूछा गया की सेवा किसकी करनी चाहिए .मंगत राम जी ने इसका उत्तर देते हुए कहा ----'दुनिया की हर वस्तु सेवा कर रही है ,सेवा करने के लिए ही पैदा हुई है लेकिन मनुष्य सदा स्वारथ के लिए ही सेवा करता है .वो स्वारथ वश ही परिवार व मित्र जनों की सेवा करता है और स्वारथ वश ही इश्वर की भी सेवा करता है इस लिए हमारा सब से बड़ा कर्त्तव्य है की हम सदा निष्काम भाव से ही सेवा करें .सभी महा पुरषों ने सेवा को सब से बड़ा पुण्य का काम माना है.निष्काम सेवा से निष्काम सुख मिलते है जो कभी समाप्त नहीं होते .
            श्री मंगत राम जी ने  अपनी माँ और शिक्षकों के कहने पर नौकरी तो कर ली पर विवाह करने से इंकार दिया .वेकहते  थे संसारी शिक्षा बहुत हो गई अब सच्चा  ज्ञान प्राप्त करना है .
       पड़ना एको नाम का और पदन दे त्याग 
   'मंगत'निश्छल चित होवे ,प्रेम हरी रास लाग.
      उन्हें कई  रिधियाँ सिद्धियाँ प्राप्त हो गई थी पर वे इन सब के प्रदर्शन के विरुद्ध थे.एक बार उनके मित्र जनों मे इस बात पर बहस हो गई की प्रह्लाद को उसके पिता ने कठोड़ से कठोड़.यातनाये दे कर मारना चाहा उसे लोहे के जलते हुए खम्बे से बांधा ऐसी परिस्थितिय्नो मे कोई केसे जीवत बच सकता है ये सब झूठी कहानियां जान पड़ती है.मंगत राम जी ने कहा 'प्रभु के सच्चे भक्त जान बुझ कर कोई चमत्कार नहीं दिखाते और न ही किसी पर अपना प्रभाव डालने के लिए ही ऐसा करते है.सहज स्वाभाव ही या फिर कभी किसी परीक्षा मे पड़ जाते है तो प्रकृति स्वयं ही वहां उपस्थित हो कर उनकी सहायता करती है .'वर्ष १९२९ मे मंगत राम जी की माता का देहांत हो गया .अब वे अपना अधिकतर  समय कश्मीर के घने जंगलों  मे जा कर तपस्या मे व्यतीत करने लगे .जब कभी उन्हें अवसर मिलता वे लोगों को सेवा और समता का उपदेश देते और उन्हें प्रेरित करने के लिए वार्षिक यज्ञ अवंम सत्संग किया करते थे .रतन दास जी उनके शिष्य थे और सदा उनके साथ रहते थे .आपने श्री मंगत राम जी के मुख से निकले श्लोकों और शिक्षाप्रद उल्लेखों को लिपि बध कर भक्तों तक पहुँचाया.
             वर्ष १९४७ मे देश के बटवारे के समय मंगत राम जी भारत आ गए .चरों तरफ फ़ैले हा हा कर को देख कर उन्हों ने कहा ऐसे पहले भी होता आया है .असी घटनाये शिक्षा प्रद होती है .संसार मे अशांति के सिवाय कुछ नहीं .हमें धरम को समझना और धारण करना चाहिए और सदा सबके साथ प्रेम पूर्वक रहना चाहिए .मंगत राम जी क्षमाशीलता मे विश्वास करते थे क्न्योकी वे सब की आत्मा मे प्रभु के दर्शन करते थे.जीवन मे सादगी और निरंतर तपस्या के फलस्वरूप उनहोंने निद्रा,  भूखऔर  प्यास पर पूरण तया विजय प्राप्त कर ली थी .जीवन पर्यंत रात का समय आपने समाधी मे ही बिताया एक बार आपने भक्तों को चेतावनी देते हुए आपने कहा था 'जब तक तू अपने कल्याण के लिए स्वयंम सोचेगा, समझेगा, मानेगा और उसी के अनुसार आचरण करेगा नहीं तब तक यदि ब्रह्मा भी आ जांए तो वे भी तेरा कुछ नहीं बना सकते .ये शारीर अपूर्ण है इसके भोग अपूर्ण है ,यह संसार अपूर्ण है ,इस अपूर्ण शारीर और अपूर्ण संसार मे पूरनता  की आशा करना मुर्खता है .यह बात तू आज समझ ले ,दास साल बाद समझ लेना या चार जनम बाद समझ लेना ,आखिर समझना यही पड़ेगा .कन्यो अपनी यात्रा लम्बी करता है .उठ जाग और अपने कल्याण मार्ग पर आगे बढ चल .मूर्ति पूजा का उल्लेख करते हुए आपने कहा था ' वहीमूर्ति  पूजा सुखदाई होती है जिससे उस मूर्ति का आदर्श  धारण कर के उन जेसा पुरुशतार्थ प्राप्त करें .' 'सत एक इश्वर है बड़ी से बड़ी कोशिश कर के सत विश्वासी होना चाहिए .'वे कहा करते थे की मनुष्य को हर समय शिक्षा की आवश्यकता होती है .इससे परमात्मा अवंम परमारथ का बोध होता है .उन्होंने समता पर जोर दिया और कहा 'समता स्वरुप असली ब्रह्मा शब्द है जो की हर प्रकार से पूर्ण है और इसका सब के अंतर मन मे व्याप्त होना बहुत जरूरी है .'वे भारत भूमि को सत और समता की कर्म भूमि मानते थे उनका कहना था जब से सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ है इस भूमि पर संत आते रहे है ओउर आते रहेंगे .ये हमारी सांस्कृतिक धरोहर है  .बहार के देशों मे तो कुछ समय पहले ही लोग जागे है .भारत के ही  श्री विवेकानंद जी और श्री रामतीर्थ जेसे महा पुरुष विदेशों मे गए औरलोगों  को कुछ  जागृत कर  आत्म  विद्या का स्वरुप बताया .
          इस तरह जीवन पर्यंत वे लोगों की निस्वार्थ सेवा कर उन्हें समता का उपदेश देते रहे और सदा इस पथ पर चलने काआग्रह करते रहे .४ फरवरी १९५४ को आपने अमृतसर मे महासमाधि ली .आप के भक्तों की संख्या बहुत अधिक नहीं है पर जो भी है उनके घरों मे आज भी बड़ों की सेवा और निष्काम सेवा भाव अपार रूप मे देखा जा सकता है.देहरादून के निकट पहाड़ों पर घने जंगलों के बीच मंगत राम जीका  आश्रम है जहाँ भक्त गन तप एवं साधना के लिए जाते रहते है .
 समता अखंड शांति ,कुल विहीन दोख से नयार.
 'मंगत रूप नारायण का ,तत्त समता विचार .

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

' बसंती चोला '

'   बसंती   चोला  '
            

                                           रंग तरह तरह के रंग --सभी लुभावने लगते हैं .प्रतेक रंग प्रतीकात्मक है .जेसे सफ़ेद रंग शांति का प्रतीक  है तो हरा रंग समृधि का वह्नी लाल रंग उग्रता को प्रगट करता है .  अलग अलग रंग देव  गणों ने धारण कर अपनेभक्तों को भी उन  रंगों मै रंग लिया है .ये सभी रंग प्रकृति ने दिए है .जब शीत ऋतू का आगमन होता है तो प्रकृति भी अपने दामन मै सहेज कर रखी कलिंयों को   पत्तों के अवगुंठन से बाहर करती है और धीरे धीरे  पेड़ पोधों के साथ साथ धरती परऔर  खेत खलिहानों मैभी  कलिंया अपना रूप ले लेती है . चारों ओर बसंत ही बसंत लहरा उठता है.यह देख कर किसान फूले नहीं समाते .नित नए  मस्ती भरे ढंग से लहलहाते खेतों  को देख आँखों मै बसे सपने मानो साकार होते दिखने लगते है .प्रकृति पर छाए बसंत उत्सव की छटा चारों और देखते ही बनती है.  प्रकृति ने प्रोतसाहित किया तो पूजा मै बसंती फुल चुन कर समर्पित किये ,बसंती वस्त्र पहन कर हवन और  यज्ञ सम्पन्न किये --यज्ञ की  पवित्र अग्नि मै पीले वस्रों का होम किया गया--पीले चावल  पका कर नेवैद्य दिया गया .यह सब कुछ समर्पण की भावना का प्रतीक  ही तो है. इतना  ही नहीं धरती  माँ ने भी अपार धन धान्य की सम्पदा और औशधिय्नो  की अनूठी देन प्रत्येक जीव धारी को समर्पित कर  आरोग्य अवंम संरख्षण के साथ साथ  जीवन के भरण पोषण का भी प्रबंध  कर दिया .

                           भारत देश एक मात्र ऐसा देश है जहाँ बसंती रंग ने त्याग के क्षेत्र मै अनोखा इतिहास ही रच  डाला है .  मातरु  भूमि के लिए अपने प्राणों को नियोछावर करने का जब जब समय आया तब तब रन बांकुरों ने बसंती बाना धारण कर  पुरे विश्व के समक्ष अपनी छाप छोड़ी है--हंस हंस कर वीरों ने अपने प्राणों की बलि चड़ा दी है .  राजपूतों की   कहानियां तो सबसे अग्रणीय  मानी जाती है   .युद्ध मै शत्रु के हाथों पराजय स्वीकार  इन्हें  कभी भी सवीकार न था . जब कभी ऐसी परिस्थितियना आती और  युध से लौट  कर आना संभव न दिखता तो  ये राजपूत कूच करने से पहले बसंती वस्त्र धारण कर लेते  थे जिसका अर्थ था आज देश के लिए प्राणों को न्योछावर करने का समय आ गया है . वीरों को अश्रु पूरण विदाई देने के बाद राजपूत स्त्रियाँ  शत्रुओं से अपनी आन बान की रक्षा के लिए आत्मदाह कर लेती थी .
                             बात अधिक पुरानी नहीं है जब अपने घर के आंगन मै बेठी एक सौभाग्य शाली माँ अपने  पति की पगड़ी रंग रही थी तब उसके नन्हे बालक ने पास आ कर कहा "माँ मेरा चोला भी बंसंती रंग दे "माँ ने मुस्काते हुए कहा था"हाँ रंग दूंगी "वे जानती थी की जंजीरों से जकड़ी भारत माता को स्वतंत्र करना ही उनके पुत्र का एक मात्र लक्ष्य था .जब जब भगत सिंह जेल गए  तब तब जेल का प्रांगन उनके प्रिय गीत "माये रंग दे बसंती चोला "की धुन से गूंज उठता था .वीरों को कर्त्तव्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने वाला ये गीत आज भी जब कभी सुनाई पड़ता है तो रोम रोम सिहर उठता है .ऐसी बसंत ऋतू को शत शत प्रणाम जिसने मानव जाति को त्याग व कर्त्तव्य की राह दिखाई .
                       यदि धर्म की दृष्टि से देखें तो गायत्री मंत्र को सिद्ध एवं सशक्त मंत्र माना जाता है .गायत्री माँ की प्रतिमा को सदा बसंती वस्त्रों से विभूषित किया जाता है ---यहाँ तक की गायत्री माँ के भक्त  बसंती बाना धारण कर अपने जीवन को जान कल्याण हेतु समर्पित कर देते है .कहते है जो काम तलवार नहीं कर सकती वो लेखनी कर देती है  पर बसंत ये तो प्रकृति की अदभुत छठा है ---न तलवारों से टपकता लहू  ,न लेखनी से निकले लेख --बस धरती की अनूठी छवि और जीव मात्र को अभय देने वाला बसंत ' तन मन मै समर्पण ,भक्ति और त्याग की भावना को जगा देता है .इश्वर से प्रार्थना है जब कभी हमारे जीवन मै बसंती चोला पहनने का अवसर आये तो हमारे हाथ न कांपे हमारे प्रयत्नों से जन जन  का कल्याण हो और भाई चारे की भावना को सदा बल मिले .