चिंगारी
विज्ञानं ने यह तो सिद्ध कर दिया है की अनुमानतः कब और कैसे यह धरती बनी तत्पश्चात कब और कैसे इस धरती पर जीवन पनपा .पानी मे जीवन की पहली साँस से ले कर धरती पर फैले अनगिनत जीवधारिन्यो के जन्म के बीच लाखों करोड़ों वर्ष लाग गए होंगे .ऐसे अनुमान भी गणित, ज्ञान विज्ञानं और तकनिकी सहायता से सिद्ध किये जा चुके है और जिनको हम सही भी मानते है .पनपती परिस्थितिन्यो के बीच समय का अनुमान कल्पना शक्ति की पराकाष्ठ ही है .पर जो सत्य है वो सत्य ही है .इस धरती पर जीवन का एक ही रूप रहा होगा पेट भरने के लिए खाद्य सामग्री की खोज और प्रजनन .और ये परिस्तिथियाँ लाखों वर्षों तक ऐसे ही चलती रही होंगी ठीक उसी तरह जेसे वर्षा शीत और ग्रीष्म ऋतू की प्रक्रिया चलती जा रही थी वेसे ही अनेकों अनेक जीव जन्म लेते होंगे व मृत्यु को प्राप्त होते रहे होंगे क्योंकि प्रकृति अपनी गति मे परिवर्तन इतनी शीघ्रता से परिवर्तन नहीं लाती. यदि कल्पना करें तो लगता है की सभी जीव इस धरती पर सामान रूप से विचरते होंगे और शारीरिक बल अवंम वजन के अनुसार अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते होंगे .तभी कंही किसी प्रजाति के हाथों से पत्थरों के बीच खेलते या फिर किसी और कारण वश कोई चिंगारी फूटी होगी वो आग का रूप धारण कर लिया होगा .जिस किसी भी प्रजाति के हाथों यह घटना घटी वह चोंका देने वाली थी, क्योंकि यहीं से सोचने की प्रक्रिया का आरंभ हुआ '.अग्नी ' जिसने सभी जीव्धारिय्नो से मानव जाति को एक अलग ही दिशा प्रदान कर दी यह जो भी अविष्कार था वो आदि मानवों की निजी सम्पति बन गया . अब धीरे धीरे चिंगारी का अर्थात अग्नि का सदुपयोग होने लगा .एक तरफ आदि मानव कर ही इससे लाभ उठाया जा सकता है .कंयोंकी जो भी वस्तु इसके पास जाती है वो नष्ट हो जाती है .मन मे सदा भय बना रहता था पर फिर भी इसने मानव जाति को अन्य जीव जन्तुय्नो से पृथक कर दिया .अब इस जाति मे सोचने विचारने की प्रक्रिया बड़ी तेजी से प्रबल हो रही थी ..शायद यह्नी कहीं इसी काल मे आपने पराये का भेद उपजा होगा .और तभी आदि मानव ने आपने चमत्कार को सहेजने के लिए समूहों मे रहना शुरू कर दिया होगा .हम इस तथ्य को कोरी कल्पना कह कर झुठला नहीं सकते .बदलाव की प्रक्रिया मे पहली इकाई परिवार ही रहे होंगे .अग्नि के कारण अधिपत्य की भावना का जन्म हुआ था तो जनम देने की प्रक्रिया मे 'ममता 'जेसी भावनाए अवश्य छु गई होंगी .ओर यही हुआ 'मै'मेरी ' और हमारी 'जेसी भावनायों का सूत्रपात . अब तक उस छोटी सी चिंगारी ने मानव जाति को अन्य प्रजतिन्यो से भिन्न बाना दिया था .भोतिक सुखों की संभवत यह पहली कड़ी थी .भोजन पका कर खाना यह अनुभव की दूसरी सीडी थी .उसके बड़ जंगली जानवरों से अपनी सुरक्षा और अँधेरी रातों मै उजाले की चमक यह विकास और गायन की एक और बड़ी सफलता थी .सब को सभी सुख सामान रूप से मिलें इसलिए लोगों ने अपना मुखिया चुन कर कबीलों और मै रहना शुरू कर दिया होगा .और यहीं से कबीलों की छोटी छोटी इकाई के रूप मै 'परिवार ' को जन्म मिला .संभव है पारिवारिक वयवस्था को बनाये रखने के लिए किसी वयोवृद्ध सदस्य को मुखिया बाना दिया गया हो.इन सब बातों के कोई लिखित प्रमाण तो नहीं है पर फिर भी इतिहास के जो पृष्ठ उपलब्ध है वे पर्याप्त है हमारी प्राचीन और अति प्राचीन सभ्यता को जानने के लिए .
एक बात और सामने आती है वो यह की जब कभी कालांतर मै गाँव शहर या राज्य्नो का विस्तार हुआ तब परिवारों की वयवस्था का देश की वयवस्था मै बड़ा योग दान रहा होगा .एक जुट हो कर रहना ,मिल बाँट कर जीवन का निर्वाह करना ,विचरों मै व कर्म मै शुद्धता एवं अहिंसा का ताल मेल बनाये रखना यह सब परिवार की ही देन था .धरती के टुकड़े के लिए या पशु धन के लिए जब आपसी झगड़ों का जन्म हुआ तभी जहाँ एक ओर रक्तपात और लूटमार बड़ी वहीँ दूसरी ओर पारिवारिक संबंधो मै दृढ़ता भी बड़ी . परिवार 'एक वो इकाई है जहाँ से अपनत्व का ममता का स्नेह का ,त्याग का ,सेवा का विश्वास का .आधारर का , आभार का,ज्ञान का ,समर्पण का ,दूसरों के लिए जीने का ,क्रोध का ,अनुशासन का, छोटों के लिए स्नेह व बड़ों के लिए माँ सम्मान आदि अनेकों अनेक भावनाओं का जन्म हुआ .एक एक परिवार में ५०-६० से भी अधिक सदस्य हुआ करते थे और सामूहिक आय व्यय का लेखा जोखा घर के मुखिया के हाथ मै होता था .यह मानव समाज का एक मजबूत संगठन था .कर्म के अनुसार समाज को बाँट कर 'जाति 'प्रथा का चलन शुरू हुआ जिससे उंच नीच के भेद भाव निःसंदेह बदने लगे पर गाँव और नगरों के बड़ते आकर को सुवय्वस्था भी मिली .मानव जाति के विकास को लाखों वर्ष बीत गए परिवार , समाज,गाँव नगर और राजन्यो अवनम गणराज्न्यो का निर्माण बनता और बिगड़ता रहा .इन सब परिस्थितिन्यो के बीच जो स्थिरता थीतो वो थी मनुष्य की निजी आवश्यकतायें जो सिमित होने पर भी जीवन निर्वाह के लिए अति आवश्यक वस्तुंए मात्र ही थी .पर फिर भी नव निर्माण का प्रवाह निरंतर प्रशस्त था .वो कभी रुका ही नहीं .एक बार जो मिल गया वह तो अपना हो ही गया पर इसके आगे और भी बहुत कुछ हो सकता है यह सोच कभी रुकी ही नहीं .खोज छोटी हो या बड़ी ,हर खोज को जीवन स्तर ऊँचा उठाने के लिए प्रयोग मै लाया जाता रहा .एक नई खोज एक नई परिभाषा ,एक नया सुख और एक नया विस्तार --परिवारों से निकल निकल कर लोग परिवार के लिए नए नए सुखों की खोज मै दूर दराज के देश प्रदेश मै फेलाने लगे और इस तरह परिवारों के संगठनो का विघटन होना शुरू हो गया .आदि काल मै भड़की चिंगारी अब एक विकराल रूप धारण कर चुकी थी .प्रगति की इस आंधी मै सब कुछ उलट पुलट हो रहा था .संयुक्त परिवार अब छोटी छोटी इकाइयों मै बंट रहे थे .सुखों को संजोने की होड़ ने देश प्रदेश के बीच की दूरियां मिटा दी --यहीं पर हुआ सभ्यता और संस्कृति का हनन स्थानांतरण से सभ्यता व आचार विचार मै परिवर्तन होने लगा .तीज त्याव्हारों को मनाना किसी भी स्थान की जल्वाऊ वहां की उपज और सदुयों से चली आ रही प्रथायों पर निर्भर करता है .इसी लिए परम्पराओं में परिवर्तन होने लगे .
इससे एक ओर तो विभिन्न कलायों का एक दूसरे मै समावेश हुआ और समाज मै समता को बल मिला वहीँ दूसरी ओर वर्षों से चली आ रहे पारिवारिक रीती रिवाज लुप्त होने लगे .अज्ज हम यह नहीं कह सकते की अमुक वयवस्था कितनी प्राचीन है . बस एक या दो सदी पहले की ही बात होगी जब कभी कोई परिवर्तन होते भी थे तो उसका आभास जीवन रहते पता नहीं चलता था .पर अब एक ही जीवन मै इतने परिवर्तन हो जाते है की इतिहास पर कभी कभी संदेह होने लगता है .यह प्रक्रिया बिना दस्तक दिए हमारे जीवन मै प्रवेश कर रही और हम आपने को धन्य मान रहे है .पर सच तो यह की जब हम आपने चारों तरफ निगाह डालते है तो आपने को बिलकुल अकेला पाते है .बचपन की ऊँगली थमने को हम तयार नहीं वह अवांछनीय है कह कर हमने अपनी भावी पीडी को संस्कार और संस्कृति विहीन कर दिया .और आपने जनम दाता प्रगति की रह मै एक बोझ कह कर उसे नकार दिया .बिखरते परिवार और टूटते रिश्तों मै हमारी भावी पीढ़ी स्नेह की शबनम से वंचित भोतिकता मै अपना संबल दुंद रही है .ऐसी परिस्थितियों को हम आपने नैतिक मूल्यों पर एक प्रहार मानते है . ज्ञान हो या विज्ञानं कोई भी खोज कोई भी भोतिक सुख हमारे नैतिक मूल्यों से ऊँचा नहीं होना चाहिए कोई भी सुख तब तक पूरा नहीं जब तक वो परिवार के बीच मिल बंट कर मनाया नहीं गया .पर अब अपनों की परिधि शुन्य से शुन्यतर होती जा रही है और इस शुन्य की शुन्यता इतनी गहरी हो चुकी है की हम अपनी मानसिक शक्तिओं की शक्ति को भुला बेठे है .हमारे पास मानसिक और व वयावहारिक उत्थान की इतनी शक्ति है की हम फिर से एक जुट हो कर सयम व संस्कारों के स्तर को ऊँचा उठा कर अपनी प्राचीन परम्प्रयों का व संस्कृति का आवाहन कर सकते है .मान मै प्रश्न उठता है--- क्या एसा होगा क्या पारिवारिक मूल्यों को हम भोतिकता की चमक से ऊपर उठ के देख पाएंगे .--
इससे एक ओर तो विभिन्न कलायों का एक दूसरे मै समावेश हुआ और समाज मै समता को बल मिला वहीँ दूसरी ओर वर्षों से चली आ रहे पारिवारिक रीती रिवाज लुप्त होने लगे .अज्ज हम यह नहीं कह सकते की अमुक वयवस्था कितनी प्राचीन है . बस एक या दो सदी पहले की ही बात होगी जब कभी कोई परिवर्तन होते भी थे तो उसका आभास जीवन रहते पता नहीं चलता था .पर अब एक ही जीवन मै इतने परिवर्तन हो जाते है की इतिहास पर कभी कभी संदेह होने लगता है .यह प्रक्रिया बिना दस्तक दिए हमारे जीवन मै प्रवेश कर रही और हम आपने को धन्य मान रहे है .पर सच तो यह की जब हम आपने चारों तरफ निगाह डालते है तो आपने को बिलकुल अकेला पाते है .बचपन की ऊँगली थमने को हम तयार नहीं वह अवांछनीय है कह कर हमने अपनी भावी पीडी को संस्कार और संस्कृति विहीन कर दिया .और आपने जनम दाता प्रगति की रह मै एक बोझ कह कर उसे नकार दिया .बिखरते परिवार और टूटते रिश्तों मै हमारी भावी पीढ़ी स्नेह की शबनम से वंचित भोतिकता मै अपना संबल दुंद रही है .ऐसी परिस्थितियों को हम आपने नैतिक मूल्यों पर एक प्रहार मानते है . ज्ञान हो या विज्ञानं कोई भी खोज कोई भी भोतिक सुख हमारे नैतिक मूल्यों से ऊँचा नहीं होना चाहिए कोई भी सुख तब तक पूरा नहीं जब तक वो परिवार के बीच मिल बंट कर मनाया नहीं गया .पर अब अपनों की परिधि शुन्य से शुन्यतर होती जा रही है और इस शुन्य की शुन्यता इतनी गहरी हो चुकी है की हम अपनी मानसिक शक्तिओं की शक्ति को भुला बेठे है .हमारे पास मानसिक और व वयावहारिक उत्थान की इतनी शक्ति है की हम फिर से एक जुट हो कर सयम व संस्कारों के स्तर को ऊँचा उठा कर अपनी प्राचीन परम्प्रयों का व संस्कृति का आवाहन कर सकते है .मान मै प्रश्न उठता है--- क्या एसा होगा क्या पारिवारिक मूल्यों को हम भोतिकता की चमक से ऊपर उठ के देख पाएंगे .--
कनक कनक ते सो गुनी मादकता अधिकाए
या खाए बोराए जग व पाए बोराए .


