मंगलवार, 26 नवंबर 2013

गुरूनानक देव जी

          गुरूनानक देव जी के जन्मदिन पर मैं उनको शत शत प्रणाम करते हुये उनकी महानता के विषय में दो शब्द कहना चाहूंगा। जो इस प्रकार हैं:
    इसके पहले कि मैं आगे कुछ लिखूं मैं यह बताना उचित समझता हूं कि मैं पिछले साठ साल से इस बुन्देलखण्ड में रह रहा हूं तथा मेरे बोलने की भाषा में हिन्दी तथा पंजाबी के शब्द मिक्स हो सकते हैं। जिस पर मैं निवेदन करना चाहूंगा कि मेरे शब्दों पर ध्यान न देते हुये मेरे विचारों को सुनने की कृपा करेंगे
           


1.     गुरूनानक देव जी सदा ब्रम्हलीन रहते थे। जैसा  कि उनके चित्रों से उनकी आंखों को देखने पर पता चलता है कि वे सदा तुरीय अवस्था में रहते हैं। इस पर गुरूवाणी में ये शब्द आता है कि ‘‘नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात‘‘ ऐसा ध्यान अवस्था में होता है।
2.    वे सदा समर्पण और सादगी में रहे। ईश्वर तक पहुंचने में जब तक निष्कपट होकर, अहंकार त्यागकर पूर्ण श्रद्धा के साथ उसका ध्यान न किया जाये उस तत्व तक पहुंचना बड़ा कठिन है। ध्यान अवस्था में अपने आपका कोई ध्यान नहीं रहता नानक देव जी ने स्वयं कहा है (रब मिलदा गरीबी दाबे दुनिया मान करती)
3.    सेवा और समभाव जब तक एक दूसरे के प्रति विश्वास और सम्मान न हो तब तक अहम नहीं छूटता और सेवा सच्चे मन से तभी हो सकती है जब अपने अहम का त्याग किया जाये। गुरूनानक देव जी ने समभाव को प्राथमिकता दी और यह कहा गया (रल छकिये वंड खायिये) जब तक ऐसी भावना न होगी समाज आगे नहीं बढ़ सकता और यदि ऊंच नीच की भावना होगी तो समता नहीं हो सकती। गुरूनानक देव जी ने इसी बात को ध्यान में रखते हुये गुरू दरबार में किसी को प्राथमिकता नहीं दी। सबको बराबर समझा और आज गुरूद्वारे का लंगर भी इसी बात का प्रमाण है कि आपस में भाईचारा बने मिलबांटकर खायें पियंे ताकि हमारा कोई भी भाई पिछड़ न जाये। इसके साथ ही गुरूद्वारे के अंदर अन्य प्रकार की सेवायें करने पर मनुष्य का अहम मिटता है। जो कि अन्य धार्मिक स्थलों पर देखने को कम मिलता है।
4.    सबसे महत्वपूर्ण बात गुरूनानक देव जी ने ये की कि अपने गुरू होने के अहम को भी समाप्त कर दिया और अपने शिष्यों को महानता देते हुये शिष्य पंथ चलाया। शिष्य शब्द को अपभ्रंश पंजाबी भाषा में सिख कहते हैं। यह एक उनकी बहुत बड़ी महानता थी। एक श्लोक आता है कि (कीट न जाने भ्रंग को ) प्रभु कर ले आप समान परन्तु गुरूनानक जी ने तो इससे भी एक कदम आगे बढ़कर शिष्य परंपरा को चला दिया। एक जगह आचार्य श्री राम शर्मा ने लिखा है कि फूल की तरह खिलें और चंदन की तरह सुगंधित हों तो भगवान भी सिर पर बिठा लेता है। 

           


5.    गुरूनानक देव जी अद्वैत मत को मानते थे। वेद में लिखे अद्वैत शब्द का अर्थ है कि उस ईश्वर के सिवाय और कोई है ही नहीं। इसी को पंजाबी भाषा में उन्होने एक आंेकार कहा और इसी के आधार पर हर शिष्य को जपजी साहब का पाठ करने के लिये कहा गया। जिसमें ईश्वर की महिमा व गुरू की कृपा से ईश्वर की प्राप्ति होती है। इन्हीं शब्दो के साथ मैं गुरूनानक देव जी को शत्-शत् प्रणाम करते हुये ये कहना चाहूंगा कि
धन गुरूनानक, धन गुरूनान... 
                                                                                लाल चन्द्र चड्ढा
                                                                                नोगाव नाका
                                                                                झाँसी रोड
                                                                                 छतरपुर (म.प्र.)

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