मंगलवार, 26 नवंबर 2013

क्या वेद और हिन्दू लुप्त हो गये हैं ?

         मेरे आदरणीय, परम पूजनीय पिताश्री ने यह लेख लिख कर कुछ चर्चात्मक बिंदुओ पर प्रकाश डाला .. निसंदेह यह गंभीर चिंतन का विषय है.. नीरा

       आदिकाल में जब धरती पर अन्य जीवों का जन्म हुआ तो इसके साथ मनुष्य का भी जन्म हुआ। धरती पर सुव्यवस्था बनाये रखने के लिये और संरक्षण के लिये यह दायित्व ईश्वर ने मुनष्य को सौंपा क्योंकि मनुष्य में अन्य जीवों में बुद्धि के साथ मनुष्य को विवेक शक्ति अलग से दी गई। जिससे कि मनुष्य को धरती का सर्वश्रेष्ठ जीव माना गया।
                       

   

 इस व्यवस्था के अन्तर्गत आदि ऋषियों ने तीन वेद लिखे जो कि ज्ञान, भक्ति और कर्म पर आधारित हैं। जिनका नाम ऋक् , साम्य, यजु रखा गया । बाद में उद्यमिता वृद्धि और विज्ञान के आधार पर अथर्ववेद रचा गया। आगे की व्यवस्था को चलाने के लिये चार वर्ण बनाये गये। ब्राम्हण को विद्या का अधिकार दिया, क्षत्री को जीवों की रक्षा, वैश्य को खेती व्यापार और शूद्र को अन्य कार्यों को संपन्न करने तथा सहायतार्थ सेवा कार्य सौंपा गया। इसमें केवल यह व्यवस्था थी, कोई ऊंच नीच नहीं थी।
    जैसे जैसे मनुष्य जाति की संख्या बढ़ी यह फैलते गये जो भारत की ओर बढ़े वे आर्य कहलाते थे। बाद में सिन्धु और फिर हिन्दू कहलाने लगे। कालान्तर में ब्राम्हण जाति ज्ञानी होने के नाते अहंकारवश अन्य जातियों से अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे और यहां से असमानता और छुआछूत चालू हो गई। कुछ समय बाद ब्राम्हण जाति ने अद्वैत को न मानकर अन्य देवी देवताओें को मानते हुये अंधविश्वास और कई प्रकार की कुरीतियों को जन्म दिया और अन्य जातियों को स्वर्ग तथा पुण्य लाभ के लालच में भ्रमित कर अपना प्रभुत्व जमाये रखा जो आज तक चल रहा है।
    इस विषय पर आदिशंकराचार्य से किसी शूद्र द्वारा शंका करने पर आदि शंकराचार्य ने इस प्रकार कहा था कि ‘‘जन्मना जायते शूद्रा संस्कारात द्विज उच्यते, वेदपाठी भवेत विप्रा ब्रम्हणां जानाति ब्राम्हणां‘‘ परन्तु ब्राम्हण समाज नेे इसे स्वीकार नहीं किया और अहंकारवश अपने अंधविश्वास और कुरीतियों को जारी रखा।
    कभी किसी ने शंका की तो उसको जबरदस्ती दबा दिया गया और उसका बहिष्कार तक कर दिया। तुलसीदास जी ने तो और भी हद कर दी कि पूजिये विप्र विवेक कुल हीना ऐसा क्यों ?
     इस विषय पर  आगे कुछ लिखने के पहले मैं कुछ दिन पहले श्री रामजेठ मलानी द्वारा श्री राम सीता व लक्ष्मण पर उठाई गई शंकाओं पर लिखना चाहता हूं।
    ये शंका जिस शब्दावली के साथ उठायी गई वह अशोभनीय है। श्री रामजेठ मलानी को एक उच्च कोटि का वकील होते हुये और हिन्दूवादी जनता पार्टी के एक उच्च राजनेता होते हुये ऐसा नहीं लिखना चाहिये था। संतों द्वारा इस पर नाराज होना व किसी अन्य द्वारा उनकी जिह्वा काटने पर 11 लाख का इनाम घोषित करना भी उचित नहीं था।   
    संत वही हैं जो सम हो और शंका का समाधान करे। नाराज होना संत का धर्म नहीं है, शंका करना शिष्य का धर्म है तथा समाधान करना गुरू का दायित्व है।
    कुछ आगे लिखने के पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं जो कुछ भी लिख रहा हूं वह केवल तुलसीदास जी द्वारा रचित रामायण तथा नरेन्द्र कोहली द्वारा लिखा गया रामायण पर आधारित नोवल के कुछ अंशों पर आधारित है। 

                                           

  1.     राम थे या नहीं .............राम हमारी ही तरह मनुष्य थे। ज्ञानवान्, मृदुभाषी, योद्धा और दूरदर्शी थे। राजा रघु के वंशज पांचवीं पीढ़ी राजा दशरथ के पुत्र थे। इसके आगे और तो नहीं जानता परन्तु इंटरनेट पर दी गई जानकारी के आधार पर राम के पुत्र कुश के वंशज लाखों परिवारों की संख्या में आज भी खुखरान के नाम से इस धरती पर हैं।
    2.    लक्ष्मण - राम की सौतेली माता सुमित्रा के पुत्र थे।
3.    सीता को गर्भ अवस्था में घर से निकालना, मांझी या धोबी की कहानी पर आधारित नहीं है। इसमें सीता को घर से निकालने के लिये पूर्णतया शान्ता जिम्मेवार है। क्योंकि सीता के वनवास से लौटने पर शांता सीता के चरित्र पर संदेह करती थी और राम को सीता के विरूद्ध उसके चरित्र को लेकर अक्सर उकसाती थी। राम क्योंकि शांता को बहुत चाहते थे उनकी बातों में आकर सीता को घर से निकाल दिया। किसी राजकन्या पर ये दोष न आये मल्लाह अथवा धोबी की कहानी को आधार बना दिया गया।
4     शांता के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। राजा दशरथ को किसी समय किसी ऋषि के श्राप देने पर राजा दशरथ एक सुन्दर स्त्री बन गये थे जिसे कोई राजा अपने साथ ले गया। और वहंां उनको गर्भ हुआ शांता पैदा हुई बाद में शांता की शादी श्रृंगी ऋषि के साथ हुई। श्रापकाल समाप्त होने पर राजा दशरथ पुनःअयोध्या लौट आये।
    यह सर्वविदित है कि राजा दशरथ की 365 रानियां थीं 3 पटरानियां थीं। वे हर वक्त विषय वासना में लिप्त होकर रानियों के साथ ही रहते थे। राज का पूरा कामकाज कैकेयी के हाथ में था। उस समय की प्रथा के अनुसार राजदूत अपनी सेनायें भी साथ लेकर आते थे और कैकेयी ने अपने भाई की सेनायें अयोध्या में रखी थीं और अपने पक्ष के राजदूतों के सेनायें अयोध्या के आसपास के प्रांतों में थी तथा दशरथ की सेनायें दूर दराज सीमाओं पर थीं। शासन पर पूरा अधिकार कैकेयी का था। राजा दशरथ कभी किसी प्रकार की कोई भी दखलंदाजी नहीं कर सकते थे। इस पर राजा दशरथ परेशान थे।
    क्या यह दशरथ का षड़यंत्र नहीं था कि दोपहर को भरत और शत्रुघन अपने ननिहाल जाते हैं और शाम को राजतिलक का मुहूर्त निकाल दिया जाता है। कैकेयी जो कि अति समझदार, होशियार, चालाक औरत थी तुरन्त कार्यवाही  करते हुये राजा दशरथ से अपने दो वर मांग लिये। राजा दशरथ इस पर मुकुर सकते थे परन्तु यह वर गुरू वशिष्ठ और सुमंत जी की मौजूदगी में कैकेयी ने शादी के पहले  राजा दशरथ से मनवा लिये थे।
    ‘‘रघुकुल रीति सदा चलि आई प्राण जाहि पर वचन ना जाई‘‘ ऐसा नहीं है  क्योंकि इतिहास में न तो राम के किसी पूर्वज ने और न ही किसी वंशज ने ऐसी कोई रीति निभाई थी। ये वन जाना राम की मजबूरी थी और इसके सिवाय कोई चारा नहीं था क्योंकि अयोध्या तथा दूर दराज तक कैकेयी के भाई की व अन्य मित्र राजदूतों की सेनायें थीं। राम विद्रोह कर सकते थे तथा  राम के कुछ विश्वस्त सैनिक भी थे। राम के कुछ विशेष शस्त्र निषादराज के पास थे और निषादराज सहायता करने को तैयार था परन्तु इस पर भी राम ने दूरदर्शितापूर्वक यह देखा कि वह कैकेयी के भाई तथा उसके मित्र राजदूतों की सेनाओं के मुकाबले किसी प्रकार जीत नहीं सकता था और हजारों लोग व्यर्थ में मारे जाते। इसलिये उन्होंने वन जाना उचित समझा, कैकेयी अपने रास्ते में कोई रोड़ा नहीं चाहती थी, लक्ष्मण को भी निकाल दिया गया।
    वन जाते समय राम के साथ हजारों अयोध्यावासी गये क्योंकि उनके मन में राम के प्रति आदर विश्वास और श्रद्धा थी परन्तु कुछ दूर जाने पर राम ने उन्हें समझाकर वापस भेज दिया। फिर भी उनके मन में राम के प्रति विश्वास और कैकेयी के प्रति घृणा थी। जिसको दूर करने के लिये कैकेयी ने अपनी रणनीति के आधार पर भरत को साथ लेकर राम को मनाने और अयोध्या वापस लाने का प्रयास किया, परन्तु यह केवल एक औपचारिकता थी और राम ने कैकेयी द्वारा भविष्य में धोखा हो सकता है वापस आने से इंकार कर दिया।  

                                                   


    हनुमान जी जब संजीवनी लेकर आये तो राम जी ने भाव विभोर होकर हनुमान जी को गले लगाया और कहा तुम मम प्रिय भरत सम भाई यहां एक संदेह उठता है क्या भरत भी ऐसे थे। जबकि हनुमान जी ने भरत को यह बता दिया था कि रामजी का रावण के साथ युद्ध चल रहा है व लक्ष्मण मूर्छित पड़े हैं और भरत की सेनायें आंध्रप्रदेश तथा कर्नाटक की सीमाओं पर थीं और भरत राम की सहायता के लिये अपनी सेनायें तुरन्त भेज सकता था। ऐसा उन्हांेंने नहीं किया क्यों - इस पर किसी लेखक ने आज तक कुछ नहीं लिखा।
    अब मैं अपने मूल विषय पर लिखना चाहूंगा
    ब्राम्हण समाज ने अपने अहम अंधविश्वास और स्वार्थवश किसी को कभी कोई शंका करने नहीं दी। आज से तीन हजार साल पहले भारत में केवल वैदिक यानि सनातन धर्म ही था। कुछ समय बाद मजबूरीवश एक हिस्सा यानि बौद्ध अलग हो गया। साथ ही जैन धर्म अलग से चालू हो गया। इसके बाद
1.     जीसिस ने केवल इतना ही कहा था कि ईश्वर एक है हम सब उसकी संतान हैं उन्हें फांसी चढ़ा दिया गया। 
2.    मोहम्मद साहब ने केवल अद्वैत ही कहा था जिसका अर्थ हिन्दी भाषा  में केवल एक ईश्वर ही है और कुछ नहीं। और इसका अर्थ अरबी भाषा में लाइला इलइल्लाह होता है परन्तु उनके साथ भी युद्ध हुआ उनका पूरा परिवार मार दिया गया। जिसके आधार पर आज भी भारत के मुसलमान हिन्दुओं को काफिर कहते हैं।    
    3.    स्वामी दयानन्द जी को वेद प्रचार पर जहर दे दिया गया।
4.    एक साल पहले स्वामी अग्निवेश ने अमरनाथ में हिमलिंग के बारे में यही कहा था कि ये प्राकृतिक प्रक्रिया है तापमान के आधार पर बन जाता है घुल जाता है, उन पर मुदकमा दायर हो गया।
      5.    रामायण में लिखे अनुसार रामचन्द्र जी ने लंका जाने के लिये एक अस्थाई पुल बनाया था जो पानी पर तैरता था ऐसा आज भी संभव है और उदाहरण के लिये कई छोटी नदियों पर ड्रमों के पुल आवागमन के लिये बने हुये हैं और कश्मीर में पानी पर तैरने वाले कुछ खेत भी हैं जिन पर आज भी खेती होती है परन्तु ब्राम्हण समाज जो कि आज संत समाज के नाम से जानी जाती है, का कहा है कि समुद्र के अंदर जो पहाड़ी है वही पुल राम ने बनाया था। यदि उस पहाड़ की मिट्टी अथवा पत्थर का हिसाब लगाया जाये तो ये कई करोड़ टन बैठेगी जो कि राम द्वारा लाये गये पत्थरों और बनाने के समय और 14 वर्ष पूरे होने की अवधि को ध्यान में रखा जाये तो ये असंभव था। परन्तु आज का संत समाज भावनाओं को ठेस पहुंचने के आधार पर अपने अहमवश सेतु समुद्रम परियोजना को पूरा होने नहीं देना चाहता।
    आज इस समाज द्वारा उनके इस व्यवहार से न केवल  वेद लुप्त हो गये हैं अथवा लाइब्रेरी की अलमारी की शोभा बढ़ा रहे हैं बल्कि हिन्दू शब्द भी समाप्त हो रहा है जैसा कि आज की स्थिति में वेद को पढ़ने वाले जो समाज की उन्नति तथा व्यवहारिकता के मूल आधार हैं शायद इस धरती पर कुछ इने गिने लोग रह गये हैं।
    भारत सरकार ने हिन्दू शब्द समाप्त कर दिया है किसी भी प्रकार के सरकारी नौकरी पाने अथवा किसी सरकारी कार्यालय मंे कोई निवेदन लगाने के लिये जो प्रपत्र निर्धारित किये हैं उनमें आदिकाल में बनाये गये चार वर्णों की जगह नये चार वर्ण बना दिये हैं  जो इस प्रकार हैं एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी. और जनरल। समाज की दिशा निर्धारित करने वाले ब्राम्हण (संत) समाज तथा देश की रक्षा करने वाले क्षत्रिय को जनरल क्लास में डाल दिया है वह रेल्वे के जनरल क्लास के डिब्बे में घुसे यात्रियों जैसे धक्के खाते व अपना अपमान सहते हुये समय गुजार रहे हैं। मैं सिर्फ आज की संत समाज और हिन्दुत्व का दावा करने वाले आर.एस.एस. तथा भारतीय जनता पार्टी से यह करबद्ध निवेदन करना चाहता हूं कि वेद और हिन्दू को बचाने का प्रयत्न करें मिट तो चुके ही
हैं।  

                                                                                लाल चन्द्र चड्ढा
                                                                                नोगाव नाका
                                                                                झाँसी रोड
                                                                                 छतरपुर (म.प्र.) 

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