देश को स्वतंत्रता प्राप्त किये आज ६४ वर्ष हो गए है, हम सब कहते है देश आजाद हुआ था पर किससे किन बन्धनों से .क्या ये किसी दूसरे देश के बंधन थे ,दूसरे देश का कानून था ,दूसरे देश की भाषा थी,या दूसरे देश की शिक्षा पद्धति ,दुसरे देश का धरम था या दूसरे देश का खान पान ओउर वयवहार था,या दूसरे देश की नित नयी खोज थी ,दूसरे देश की चमक दमक थी या फिर दूसरे देश की लाठी की मार थी जो हर भारत वासी की आत्मा को दबोचे जा रही थी .इन सब बातों का जवाब देना आसन नहीं है -- इतिहास के उन पन्नो को खोलेंगे तो समझेंगे की हमारी भारत भूमि विदेशी सत्ता के बीज बोने के लिए इतनी उपजाऊ कन्योकर सिद्ध हुई --ऐसा क्या था जो बाहरी ताकतों को आकर्षित कर रहा था .ये पहली बार तो था नहीं की देश पर विदेशी ताकतों ने हमला किया हो .पर जब जब हमला हुआ तो वो बस लूट पट तक ही सीमित था . विदेशी आते आक्रमण करते धन संपदा लूटते और अपने देश लौट जाते ,कारण था देश वासियों का ऐसे समय पर एक जुट हो जाना .और इसका कारन था की भिन्न भिन्न भाषाओँ के चलते भारत की सभ्यता , संस्कृति और धरम एक ही था .पर धीरे 2लालच की काली छाया ने अपना रंग जमाया,हमारी आत्म शक्ति का हनन होने लगा और आत्म विश्वास डगमगाने लगा ,शिक्षा कुछ मुठी भर लोगों की दासी हो गई .अब जिन लोगों के हाथों मै सत्ता थी उनका लालच बदने लगा . गरीब और गरीबी ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गई .लोगों ने आजादी को मन वचन और करम से लूटना शुरू कर दिया हर व्यक्ति वो राजनेता हो ,हरिजन,परिजन्य या फिर विप्रजन हो सभी एक ही राह पर बढ चले .
सन १९४७ मै जब देश आजादी की और धीरे धीरे बढ रहा था तब कुछ वरिष्ट नेताओं का यह मानना था की मशीने ,कारखाने और तकनिकी ज्ञान जो पश्चिम देशों से भारत मै आ चूका है वही कल के सुनहरे भारत का आधार होगा और हुआ भी --पर इस ओर बड़ते कदमों ने सही रास्ते पर चल कर अपनी मंजिल नहीं चुनी .लोगों ने देश को स्वतंत्रता दिलाने मै जो कष्ट उठाये थे और जान मॉल की हानि को झेला था अब उसकी भर पाई चुकाने का समय आ गया था .गरीब जो सदा से गरीब थे वो तब भी गरीब थे और आज भी गरीब ही है पहले भी उनका शोषण होता था आज भी होता है.चारों तरफ एक होड़ सी मच गई.धन के कई रूप प्रगट होने लगे काला धन सफ़ेद धन ,मेहनत का धन ,ज्ञान का धन,लूट का धन,चोरी का धन भ्रष्टाचार का धन ,ज्ञान का धन,पसीने से तर-बतर धन मेरा धन तुम्हारा धन ---पर सुख के सब साधन बटोर कर भी ,देश मै उन्नति का हर द्वार खुलने पर भी देश जितना पहले निर्धन था उतना ही आज भी निर्धन है .आज अन्ना हजारे या उन जेसे और लोग जो अब काले धन की और भ्रष्टाचार की गुहार लगा रहे है तब ये लोग कहाँ थे जब लोगों ने पहले पहल भ्रष्टाचार की ओर अपने कदम बदये थे .अन्ना ने अपनी जवानी से ले कर बुदापे तक का समय क्या भ्रष्टाचार का चल चित्र देखने मै बिता दिया ओर जब देश पूरी तरह से इस काली आंधी मै घिर चूका है तो ये दो गज जमीं अनशन करने के लिए मांग रहे है .अपनी जवानी मै अगर जवानों को यह राह दिखाई होती तो आज आगे कुंयाँ और पीछे खाई न होती .या फिर यह सब मिडिया की चमक दमक है .
बात कोई भी हो पर उसे सरकार से मनवाने का ये क्या तरीका है की आप सारे देश मै अपनी मनमानी करते फिर रहे है जलूस निकले जा रहे है रास्ता रोको या अनशन के नाम पर भीड़ जुटाई जा रही है और इस सब के चलते आम आदमी के जीवन मै जो परेशानिया आती है उन सबको नजर अंदाज कर दिया जाता है .वे मजदूर जो दिन भर कड़ी मेहनत कर शाम की रोटी का इंतजाम करते है उनको सच पूछा जाये तो भ्रष्टाचर का अर्थ भी नहीं मालूम वे सब जलसों और हर्तालों के चलते अपनी मजदूरी खो बैठते है ऐसे मै उनकी भूख का जिम्मेदार कौन है इनके बच्चों की अधूरी शिक्षा का जिम्मेदार कौन है .ये वो लोग है जिनको जीवन के सुख दुःख से कोई सरोकार नहीं बस दो वक्त की रोटी मिल जाये .पर इनका उपयोग नेता अपनी आवाज बुलंद करने के लिए करते है और कहने को उनकी भलाई के लिए कर रहे है ऐसा दावा भी करते है.संविधान मै समय के साथ बदलाव जरूरी है पर क्या ये सब मात्र शोर मचाने से ही हासिल कर सकते है.क्या आम आदमी को आगे भी येही सब सहना होगा . ऐसे दिशा विहीन लोगों की तरफ देखती हूँ तो लगता है मानो ये मनुष्य नहीं है भीड़ छट जाने के बाद खाली पंडाल में इधर उधर बिखरी पड़ी कुर्सियां है .
..नीरा भसीन





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