गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

सुबह के जोश की सारी रैली शांत सोई पड़ी थी।


                                          ओला  रैली 
                             
     जिस गति से आज समाज में तकनीकी उप्लाब्धिंयो का संचार हो रहा है उससे कहीं अधिक गति से सन्युक्त परिवारों और उनके मूल्यों का हनन भी  हो रहा है । मेरे परिवार मे भी कुछ ऐसा ही हो रहा था । घर में एक नए सदस्य के आने से आपसी मतभेदों का भी घर मे प्रवेश हो चुका था । विचारों के टकराने के फलस्वरूप आपस मे दूरियां बढ़ने लगी ।और एक  दिन बड़े भारी  मन  से  अपने उस घर को जहाँ मैं  ब्याह कर आयी थी  त्याग दिया । मैं राजा मंडी स्टेशन पर खड़ी थी मन भारी  था कि इस बार अपने पति और बच्चों के पास हैदराबाद जाने पर फिर शायद ससुराल लौटना संभव न हो ।
          राजा मंडी स्टेशन पर अधिकतर गाड़ियां रूकती  थीं । फिर जिस गाड़ी से मुझे जाना था वो तो पैसेंजर गाड़ी थी और हर छोटे बड़े स्टेशन पर रूकती थी । यह गाड़ी दिल्ली  से इलाहाबाद जाती थी । मेरी यात्रा ५ घंटे की थी कयोंकि मुझे रस्ते में ही हरपालपुर उतर  जाना था  । बिखरते रिश्तों का बोझ मन लिए मैं प्लेटफार्म पर खड़ी थी
        भाई बन्धु ये सब स्वार्थ के रिश्ते एक गांठ की तरह होते हैं जरा सी चूक या अनजाने संदेह इस गांठ को पल भर में खोल देते हैं । दूर से गाड़ी आने का संकेत दिखा । पंजों के बल खड़े हो कर गर्दन को और लम्बी खींच कर जब यह सुनिश्चित कर लिया की हमारी ही गाड़ी है तो बैग की तरफ ध्यान गया । अभी  बैग  और थैले हाथ में समेटे ही थे की गाड़ी का इंजन धड़धड़ाते हुए सामने से गुजरा । गाड़ी की हालत देख कर घबराहट होने लगी हर दरवाजे पर दस दस आदमी लटके थे, कुछ खिडकिँयो पर तो कुछ छत पर भी अटके दिखे । रिजर्वेशन थी पर मेरी रिजर्व सीट वाला डिब्बा आगे निकल गया, मै डिब्बे के साथ साथ दौड़ने लगी । यहाँ गाड़ी बस ५ मिनट ही रुकती थी मैं किसी तरह भीड् में घुसती घुसाती टकराती अपने डिब्बे एक पहुँच गई । लोग तो चलती गाड़ी मे ही धकापेल कर चढ़ रहे थे । मेरे डिब्बे के सामने भारी बेकाबू भीड़ थी । गाड़ी के अंदर भी तिल रखने की जगह न थी । पर फिर भी मन में तसल्ली थी की मेरी सीट रिजर्व है । लेकिन अंदर जाना  .. उफ़ ... पल भर को मन मे आया ,क्या लौट जाऊँ ... इतनी भीड़ है और मुझे  अकेले  जाना है पीछे मुड़ कर न देखने का मन में  निश्चय कर चुकी थी और फिर  आगे हैदराबाद जाने की सारी  व्य्वस्था  भी गड़बड़ा जाएगी । इस बीच मैं भीड़ के बहाव में फंस चुकी थी अब मैं सिर्फ उधर ही जा सकती थी जिधर भीड़ जा रही थी  कि अचानक इसी धकापेल में मैं गाड़ी के अंदर जा पहुँच गई ।
         
      राहत  की सांस ले सको ऐसा तो वहां दृश्य ही नहीं था ।  तीन टायर वाला स्लीपर  डिब्बा था और आठ लोगों की जगह पर अड़तीस लोग बैठे थे एक दूसरे से अटे सटे सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। सहसा तभी जोर से नारे बाजी  शुरू हो गई, तब समझ में आया की कल दिल्ली में जिस विशाल  रैली का आयोजन हुआ था, ये सब लोग वहां निमंत्रित थे और बाँदा से दिल्ली तक इनके मुफ़त में  आने जानेका प्रबंध रेलवे वालों ने कर रखा था । इसलिए इतनी भारी मात्रा में लोग यात्रा कर रहे थे । नारे लगाते लोगों में जोश भड़क रहा था और वहां पर उन्हें शांत कराने वाला भी कोई नहीं था । यहाँ तक की टी . टी . को भी लोगों ने डिब्बे में घुसने  नहीं दिया । जिनकी रिजर्वेशन थी वे भी प्लेटफार्म पर दयनीय अवस्था में इधर उधर देख रहे थे । टी. टी. ने भी हाथ खड़े कर दिए । मै और एक लड़का और जो कोई परीक्षा देने झाँसी जा रहा था पता नहीं कैसे डिब्बे में घुस गए थे \वो लड़का घबरा गया और रोने लगा । शायद वो पहली बार कहीं अकेले जा रहा था । मेरे पूछने पर उसने बताया सुबह उसकी परीक्षा है और परीक्षा न देने से उसे नौकरी हाथ से जाने का डर था । मैंने उसे धीरज  बंधाया कोई और सहायता कर पाना नामुमकिन था। बस इतना ही कहा जहाँ खड़े हो वहीँ खड़े रहो डरो मत। दो  तीन  घंटे में झाँसी पहुँच जाओगे। लड़के ने आंसू पोंछे और सीढ़ी को पकड़ कर खड़ा हो था गया। पर मैं अपना क्या करूँ इतनी देर खड़े रहना मेरी टांगो में इतना दम  नहीं था। इतने में अहसास हुआ की गाड़ी राजामंडी स्टेशन छोड़ कर आगे बड़ चुकी थी। अब गाड़ी के अंदर चल रही नारे बाजी भी थम चुकी थी। गाड़ी में तिल रखने की जगह नहीं है यह कहावत प्रत्यक्ष दिख रही थी। मै बड़ी धीमी गति से अपनी रिजर्व सीट तक पहुंची ही थी की गाड़ी आगरा कैन्ट रुकी। गाड़ी के रुकते ही लोगों ने कुछ झंडे निकाल कर हाथों पैर फैला लिए और पूरे जोश के साथ   नारे बाजी  शुरू कर दी। लोग जो डिब्बे के अंदर बैठे थे दरवाजे और खिडकिँयो पर  लटके थे सभी नारे बाजी  कर रहे थे।
                    
      मैने खिड़की से झाँकने पर देखा की एक टी टी आया दरवाजे से अंदर घुसने की कोशिश की पर वो वापिस चला गया । जान सब को प्यारी होती है। आगरा कैन्ट कोई गाड़ी में चढ़ नहीं सका ,घंटे  भर से प्रतीक्षा कर रहे लोग प्लेटफार्म पर अपने बैग  अटैची  उठाये वैसे ही मुंह लटकाये खड़े रहे। गाड़ी के किसी भी डिब्बे में चढ़ पाना असंभव था। बाद में पता चला की जिस भीड़ के साथ मैं डिब्बे में घुस गई थी वो इस रैली के वे लोग थे जो ताजमहल ,सिकंदरा आदि देखने के लिए सुबह पहले ही निकल आये थे और राजामंडी स्टेशन पर इस गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। गाड़ी ने कैन्ट स्टेशन छोड़ दिया और इसके साथ भीड़ भी शांत हो गई। मेने अपना सीट नम्बर चैक किया  गलियारे की नीचे वाली सीट थी ।और उस पर सात आठ लोग बैठे थे। दूसरी सारी  सीटों का भी यही हाल था। किसी ने पीठ को टेड़ा कर  किसी ने गर्दन  टेड़ी की, बस यूँ ही फसफसा के सब बैठे थे। बर्थ के नीचे बीच रास्ते में दरवाजे पर जहाँ देखो वहां लोग ही लोग। मैं इस हालत में किस से क्या कहूँ पर  इस हालत मे हरपालपुर तक खड़े खड़े जाना भी तो संभव नहीं था
      थोड़ी देर इधर उधर देखा, कोई जानना सवारी नहीं थी... अब... अब क्या हिम्मत बटोरी और बात करने  के लिए गले में अटकी थूक गटकी की डिब्बे के दूसरे छोर  से आवाज आई "अरे हल्काइन भैया जरा बीड़ी की पुड़िया तो भेजो " सामने बैठा आदमी जो बात -चीत में कुछ समझदार और इन लोगों का मुखिया लग रहा था जोर से हंस पड़ा और बोला "यहां सांस नहीं मिल रही और इन्हे बीड़ी चाहिए। "और जोर से बोला "चुपै चाप से बैठे रओ --बीडी चैये जैदा बकौती  किये तो उठा के बाहर फेंक दइयें...ससुर का नाती। " और अपनी बात को दो चार बुंदेलखंडी गालिंयो से अलंकृत भी कर दिया। इतने मे गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी। सबने फ़ौरन झंडे निकल लिए और नारे बाजी शुरू कर दी। जब गाड़ी चल पड़ी तो फिर सब आपस में बात करने में व्यस्त हो गए। 
     अब मैने भी हिम्मत कर के उस उस लीडर जैसे दिखने वाले आदमी से कहा 'भैयाजी जरा  थोड़ी बैठने की जुगाड़ हमाई भी हो जाती तो मेहरबानी हो जाती आपकी"मैने जानबूझ कर अपनी बात बुंदेलखंडी भाषा में कही थी। उसने कुछ हँसते हुए कहा "इते किते जागा दिख रई है आपको "मेने कुछ और नम्र पड़ते हुए कहा " अब ऐसा है जदि आप थोड़ी व्य्वस्था करने का कष्ट करेंगे तो जगह भी बन जाएगी। "  "अरे बिन्नू  हमने कई न कि नाइ हो सकत ".... "अरे भैया जी आप कोसिस तो करो "मैने बात को शहद में लपेटते हुए कहा। "अरे कहे की कोसिस। ..कैसी  कोसिस "जवाब में थोड़ा गुस्सा था। मैने कहा "भैया जी आप सब भी तो बैठे हो ५ --६ घंटे का सफर है अब आपई सोचो। ".... "का ....हम का सोचें बाई जी "...."चलो फिर जैसी आपकी मर्जी हम तो ई लाने अनुरोध कर रहे थे की हमाई तबियत काफी ख़राब चल रई है .... अरे वोई दिल के मरीज है सो डर लग रहा था की कई गिर गिरा न पड़े। गाड़ी चढ़ने में भी तो काफी धक्का मुक्की हो गई थी। "जरा सा दम लेकर मैने फिर कहा "अब घंटे भर से खड़े है तो टांगे  कांप रई है वो अलग और उम्र भी तो हो गई है....नई तो हम तो खड़े खड़े चले जाते। पर आप से एक ठो अनुरोध है भैया जी अगर जदि हम बेहोस हो के गिर गिरा पड़े तो हमें हरपालपुर में सटेसन  मास्तर  के पास छोड़   देना ". उस आदमी के चेहरे के भाव कुछ बदले और बड़े ही नकली आदर भाव से बोला "एक बात हमें बताओ बाईजी जदि आपकी तबियत इतनी ख़राब थी तो आपने रिजर्बेशन क्य्नो नई  करबाया। "मुझे उस गांव वाले के भोलेपन पर मन ही मन हंसी आ गई ,बात को टालने के लिए उसने अपना मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया और नाक मुंह को टेड़ा मेड़ा कर के अंगूठे के नाख़ून को तोड़ने की कोशिश करने लगा। 
           अब जब बात का सिलसिला जारी हो चुका था तो मैने भी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा "अरे मेरा रिजर्बेशन तो है "...."होगा लेकिन आपने गलत टेसन से गाड़ी पकड़ी है "तोड़े हुए नाख़ून को उसने  खिड़की से बाहर  उछालते हुए कहा। "नहीं भैया जी मेरा रिजर्बेसन इसी गाड़ी से और राजामंडी से  ही  है ".... "हम कए रै है की हो ही नै सकत ....आप के कैने से का होत है "हवा में हाथ उछलते हुए वह अपनी बात पर  अड़ा रहा और बोला "अरे हमें पक्के से मालूम है राजामंडी से इस गाड़ी में रिजर्बेसन हैए नाइ ,और अगर हो तो जो कओ बो हारने को तयार है "अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे ,मेने तपाक से कहा चलो हम सबूत देते हैं  पर आप अपनी जबान से फिर तो न जाओगे ".... "अरे बाईजी ठाकुर की जबान है एक बार जो कै देइ सो कै देइ। "साथ बैठे कई  लोगों ने हाँ में हाँ मिलाई और ठाकुर सब ने बड़ी गर्व भरी दृष्टि से से सबकी तरफ देखा कयो की वे तो कभी गल्त हो ही नहीं सकते ठाकुर मालिक जो ठहरे। दो तीन लोगो ने और शह ते हुए कहा "हाँ हाँ बाई जी जो चाहे सर्त बद लो। मेने सब की तरफ देखते हुए कहा "तो जे पक्की रेई ,जदि हमाई  बात सच निकली तो आप हमें हरपालपुर तक बैठ के जाने के लिए सीट दे दोगे ""हाँ पक्की बात---- दी  सीट हमने "........
           मैने अपने पर्स से अपना टिकट निकाला और उन सज्जन के हाथ में देते हुए कहा "लो भैया जी आप खुदाई बांच लो राजामंडी से हरपालपुर तक का रिजर्बेसन है की नै। "बड़े बुझे मन से उसने मेरे हाथ से टिकट ले लिया....टिकट को कभी सीधा पकड़ा कभी उल्टा कभी आगे देखा कभी पीछे कैसे क्या पड़ना है उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था ,एक लड़के से उसने धीरे से पूछा "जे कोन सी भाषा है "लड़के ने भी मुंह बिदका दिया कम्प्यूटर वाला टिकट था मैने कहा "भइया जी इंग्लिस में है कौनौ और से पड़ा के देख लो ....अगर आप चाहो तो "वो जो लड़का परीक्षा देने जा रहा था कहीं दूर खड़ा था उसे खोज के लाया गया और टिकट जोर से पड़ने को कहा। सब सुनाने के बाद वो आदमी बगलें झाँकने लगा मैने कहा "अब बोलो भैयाजी " अब का बोलें बाई जी "मेरी सीट पैर बैठे आदमिंयो से उसने उठाने का इशारा किया और मुझसे बोला "आप बैठो अपनी सीट पर "और मेरी टिकट मुझे  वापिस थमा दी। मेने बैठ कर राहत की सांस ली उस लड़के को भी बिठाया। रात तीन बजे मै हरपालपुर उतर गई। सारी रैली शांत सोई पड़ी थी।  
                      ( पुराने यात्रा संस्मरण पर आधारित )
                                                           - नीरा भसीन

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